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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 696 में से

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( ४६० ) बंधनों से मुक्त होते हैं वे ही पुण्य पापों से मुक्त निरंजन, तथा नाम रूप से विमुक्त हैं। पुण्यपाप निबंधक अचित् (जड) संसर्ग से होने वाली नामरूप की अस्मिता (अर्थात् यह मेरा नाम, यह मेरा रूप है) ही संसार है। पुण्यपाप रहित निरंजन-प्रकृति संसर्ग शून्य, परब्रह्म के साथ अत्यंत साम्यता को प्राप्त पुरुष के लिए, प्राप्य रूप से जिनका निर्देश किया गया है, वह, स्वर्ग पृथ्वी आदि आयतन परं पुरुष परमात्मा ही हैं। परब्रह्मासाधारणशब्दादिभिः परमेव ब्रह्मेति प्रसाध्य, प्रत्यगा- त्मा साधारणशब्दाभावाच्चायं पर एव-इत्याह- जो परमात्म बोधक असाधारण शब्दों का उल्लेख, द्युभू आदि प्रकरण में है, वह परब्रह्म का ही है, इस सिद्धान्त का निर्णय करके-अब सिद्धान्त भी पुष्टि करेंगे कि—इस प्रकरण में किसी भी ऐसे साधारण शब्द का प्रयोग नहीं है कि जिससे जीवात्मा को आयतन माना जा सके; यह परमात्मा ही आयतन है इत्यादि— नानुमानमतच्छब्दात् प्राणभृच्च ।१।३।३॥ यथाऽस्मिन् प्रकरणे प्रतिपादक शब्दाभावात् प्रधानं न प्रति- पाद्यम्, एवं प्राणभृदपीत्यर्थः । अनुमीयत इति अनुमानं परोक्तं प्रधानमुच्यते, अनुमानप्रमितत्वादानुमानमिति वा, अतच्छब्दात् तद् वाचिशब्दाभावा दित्यर्थः । “अर्थाभावे यदव्ययम्” इत्यव्ययीभावः । जैसे कि—इस प्रकरण में एक भी ऐसा शब्द नहीं मिलता, जिससे कि—प्रधान प्रकृति का आयतन रूप से प्रतिपादन हो सके, वैसे ही जीवात्मा बोधक शब्दों का भी अभाव है। सांख्यशास्त्र में प्रधान को आनुमानिक कहा गया है, क्योंकि यह अनुमान से ही प्रतिपादित है [अर्थात्-जीवात्मा ने, जिस अप्रत्यक्ष शक्ति द्वारा अपने को अभिभूत परवश माना उसे ही संसार बंधन का “प्रधान” कारण माना, स्वभावगत होने से उसे “प्रकृति” कहा तथा जीवात्मा पर शासन करने वाली “माया” समझा, ये सब कुछ अनुमान ही मात्र है अतत् शब्दात् का तात्पर्य है, उस प्रधान संबंधी शब्दों का अभाव । पाणिनीय व्याकरण के ankurnagpal108@gmail.com

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