भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४६१ ) नियम “अर्थाभावे यदव्ययम्” के अनुसार “अतच्छब्दात्” पद में अव्ययी- भाव समास है । इतश्चायं न प्रत्यगात्मा—इसलिए भी यह जीवात्मा आयतन नहीं है कि-- भेदव्यपदेशात् ।१।३।४॥ “समानेवृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” इत्यादिभिर्जीवाद् विलक्षणत्वेनायं व्यपदिश्यते । अनीशया भोग्यभूतया प्रकृत्या मुह्य- मानः शोचति जीवः अयं यदा स्वस्मादन्यं सर्वस्येशं प्रीयमाणम्, अस्य ईश्वरस्य महिमानं च निखिलजगन्नियमनरूपं पश्यति, तदावीतशोकोभवति । “शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीवात्मा, गहरी आसक्ति में डूबा हुआ है असमर्थ होने से वह मोहित हुआ शोक करता है । जब यह भक्तों द्वारा नित्य सेवित, अपने से भिन्न प्रभु को और उसकी महिमा को जान लेता है, तब सर्वथा शोक रहित हो जाता है” इत्यादि में परमात्मा को जीव से विलक्षण बतलाया गया है । उस वाक्य का तात्पर्य है कि-अनीश भोग्यरूप प्रकृति से मोहित जीवात्मा शोक करता है जब यह, अपने से भिन्न सर्वेश्वर की दयालुता महिमा और सर्वजगतनियामकता को देखता है तब शोक रहित हो जाता है । प्रकरणात् १।३।५॥ प्रकरणंचेदं परस्य ब्रह्मण इति “अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः” इत्यत्रैव प्रदर्शितम् । नाडी संबंधबहुधाजायमानत्वमनः प्राणधार- णैश्च प्रकरणविच्छेदाशंकामात्रमत्र पर्यहाष्मं । यह प्रकरण परब्रह्म के वर्णन का ही है, जैसा कि-‘अदृश्यत्वादि” सूत्र १।२।२१। में दिखलाया गया है । यहाँ केवल नाडी संबंध, बहुधा- जन्म, मनप्राण आदि धारकता इत्यादि कुछ विशेषताओं को जीवात्मा संबंधी मानने की शंका की गई, और उसी का परिहार किया गया । ankurnagpal108@gmail.com

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