भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४६२ ) स्थित्यदनाभ्याञ्च ।१।३।६।। “द्वा सुपर्णा सप्रजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते, तयोर- न्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इत्येकस्य कर्म- फलादनम्, अन्यस्य च कर्मफलमनश्नत एव दीप्यमानतया शरीरान्त- स्थितिमात्रं प्रतिपाद्यते । तत्र कर्मफलम् अनश्नन् दीप्यमान एव सर्वज्ञोऽमृतसेतुः सर्वात्मा द्युम्वाद्यायतनं भवितुमर्हति, न पुनः कर्म- फलमदन् शोचन् प्रत्यगात्मा, अतोद्यु॒भ्वाद्यायतनं परमात्मेति सिद्धम् । “सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने वाले, दो पक्षी, एक ही वृक्ष पर रहते है, उन दोनों मे एक वृक्ष के फलों को स्वाद से खाता है, दूसरा-उनका उपभोग न करके, केवल देखता मात्र है।” इत्यादि में एक का कर्मफल भक्षण और दूसरे का भक्षण न करके, एक- मात्र प्रकाशरूप से, स्थित होना बतलाया गया है । इसमें कर्मफल न भोगने वाला प्रकाश स्वरूप ही सर्वज्ञ, अमृत सेतु, सर्वात्मा द्यु पृथ्वी आदि का आयतन हो सकता है; कर्मफल को भोगने वाला दुःखी जीवात्मा उक्त गुणों वाला नहीं हो सकता । इससे सिद्ध होता है कि--द्युपृथ्वी आदि का आयतन परमात्मा ही है । २ भूमाधिकरणः— भूमा सम्प्रसादादध्युपशात् ।१।३।७।। इदमामनन्ति छन्दोगाः “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा, अथ यत्रान्यत्पश्यति अन्यच्छृणोति अन्य- द्विजानाति तदल्पम्” इति । अत्रायंभूमशब्दो भावप्रत्यान्तो व्युत्पा- द्यते । तथा हि पृथिव्यादिषु बहु शब्दः पठ्यते, ततः “पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा” इति इमनिज प्रत्यये कृते “बहोर्लोपोभू च बहोः” इति प्रकृति प्रत्ययोर्विकारे भूमेति भवति । भूमा बहुत्वमित्यर्थः । अत्र ankurnagpall08@gmail.com