भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 525

( ४६३ ) चायं बहुशब्दो वैपुल्यवाची न संख्यावाची । "यत्रान्यत्पश्यति— तदल्पम्" इत्यल्पप्रतियोगित्व श्रवणात् । अल्पशब्द निर्दिष्ट धर्मि- प्रतियोगि प्रतिपादन परत्वादेव धर्मिपरश्च निश्चीयते न धर्ममात्र- परः । तदेवं भूमेति विपुल इत्यर्थः । वैपुल्यविशेष्यश्चेहात्मेत्यवगतः "तरति शोकमात्मवित्" इति प्रक्रम्य भूमविज्ञानमुपदिश्य "आत्मैवेदं सर्वम्" इति तस्यैवो पसंहारात् । छान्दोग्योपनिषद में कहा गया है कि—"जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है, किन्तु जहाँ कुछ और देखता, और सुनता, और जानता है, वह अल्प है।" इस वाक्य का प्रयुक्त भूमा शब्द, भावात्मक तद्धित प्रत्यय से बना है । "बहु" शब्द का पाठ पृथिव्यादि शब्द के साथ किया गया है।"पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा" इस पाणिनि सूत्र से इमनिज् प्रत्यय करने पर "बहोर्लोपो भूच बहोः" इस पाणिनीय सूत्र से प्रकृति प्रत्यय में, विकार करने पर "भूमा" शब्द निष्पन्न होता है। भूमा शब्द बहुत अर्थ वाला है। बहु शब्द यहाँ पर विपुलतावाची है, संख्यावाची नहीं है । "यत्रान्यत् पश्यति तदल्पम्" इसमें प्रतियोगी रूप से अल्पत्व का उल्लेख किया गया है, इससे सिद्ध होता है कि बहु शब्द विपुलतावाची है जैसे कि—अल्प शब्द, धर्मी अर्थात् अल्पता वाले विशिष्ट पदार्थ का बोधक है, वैसे ही यह भूमा शब्द भी उसके विपरीत अर्थ का प्रतिपादन करता है, इससे ज्ञात होता है कि— भूमा शब्द भी विपुलता वाले विशिष्टपदार्थ धर्मी का प्रतिपादन करता है, यह केवल धर्म (विशेषता) मात्र का प्रतिपादक नहीं है । इस प्रकार भूमा का अर्थ होता है विपुल । विपुलता धर्म से विशेष्य आत्मा ही यहाँ अभिधेय है "आत्मज्ञ पुरुष शोक को पार करता है" इत्यादि से भूमा विज्ञान का उपदेश देकर "यह सारा जगत् आत्म स्वरूप ही है" इत्यादि से उसी भूमा तत्त्व का उपसंहार किया गया है । अत्र संशय्यते—किमयं भूमागुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा उत पर- मात्मा इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? "श्रुतं ह्येव में भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मवित्" इत्यात्मजिज्ञासयोपसेदुषे नार-

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक) · पृष्ठ 525, कुल 696 में से · BharatKosha