भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४६४ ) दाय नामादिप्राण पर्यन्तेषु उपास्यतयोपदिष्टेषु “अस्ति भगवो नाम्नोभूयः” “अस्ति भगवो वाचो भूयः” इत्यादयः प्रश्नाः “वाग्वाव नाम्नोभूयसी” “मनो वाव वाचो भूय.” इत्यादीनि च प्रतिवचनानि, प्राणात् प्राचीनेषु दृश्यन्ते, प्राणे तु न पश्यामः । अतः प्राणपर्यन्त एवायमात्मोपदेश इति प्रतीयते, तेनेह प्राणशब्द निर्दिष्टः प्राण ग्रहचारी प्रत्यगात्मैव न वायु विशेष मात्रम् । “प्राणो ह पिता प्राणो ह माता” इत्यादयश्च प्राणस्य चेतनतामवगमन्ति। “पितृहा मातृहा” इत्यादिना सप्राणेषु पितृप्रभृतिषूपमर्दकारिणि हिंसकत्वनि मित्तो- पक्रोशवचनात्सेष्वविगतप्राणेष्वत्यंतोपमर्दकारिण्यप्युपक्रोशाभाववच्च- नाच्च हिंसायोग्यश्चेतन एव प्राण शब्द निर्दिष्टः । अप्राणेषु स्थाव- रेष्वपि चेतनेषूपमर्दभावाभावयो र्हिंसातदभावदर्शनादयं हिंसा योग्य- तया निर्दिष्टः प्राणः प्रत्यगात्मैव निश्चीयते । उक्त विषय में संशय होता है कि—भूमा गुण विशिष्ट जीवात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा क्योंकि--“मैंने आप जैसों से सुना है कि-आत्मवेत्ता शोक से पार हो जाता है” आत्मज्ञान के उद्देश्य से आए हुए नारद द्वारा ऐसा प्रश्न करने पर, सनकादि कुमारों ने उन्हें उपास्य रूप से उपदिष्ट नाम से लेकर प्राणतक सभी के विषय में “भगवन् ! नाम से बड़ा कुछ है क्या ?” भगवन् ! वाक्य से बड़ा कुछ है क्या ?” इत्यादि प्रश्नों तथा “नाम से वाक्य बड़ा है— “वाक्य से मन बड़ा है” इत्यादि उत्तरों में जो उपदेश दिया उसमे प्राण के पूर्ववर्त्ती, शब्द, वाक्य आदि का ही उल्लेख किया, प्राण का नही किया, जिससे ज्ञात होता है कि-प्राणतक ही आत्मोपदेश दिया गया [अर्थात् प्राण, नाम आदि सभी से, श्रेष्ठ है, उससे बड़ा कोई नही है] इससे यह भी ज्ञात होता है कि-प्राण का तात्पर्य, केवल वायुमात्र नही है अपितु प्राण शब्द अपने अपने सहचारी जीवात्मा का ही बोधक है। “प्राण ही पिता है, प्राण ही माता है” इत्यादि से प्राण की चेतनता ज्ञात होती है । “पितृहा मातृहा” इत्यादि मे, प्राणवान माता-पिता की मारने वाले की ही. ankurnagpal108@gmail.com