भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४६५ ) हिंसा निमित्तक निन्दा की गई है। उन्हीं माता पिता के प्राणरहित हो जाने पर, उनकी कपाल क्रिया आदि निर्दयतापूर्ण क्रियाओं की हिंसात्मक रूप से निंदा नहीं की जाती, हिंसा चेतन की ही होती है, उस चेतन को ही प्राण शब्द से निर्दिष्ट किया गया है। प्राणवायु रहित निश्चेष्ट स्थावर पर्वत वृक्षादिकों में भी, चेतनता और अचेतना मान कर हिंसा और अहिंसा मानी गई है; जिससे निश्चित होता है कि चेतन जीव ही, प्राणवाची है । अतएव च अरनाभि दृष्टान्ताद्युपन्यासेन प्राण शब्द निर्दिष्टः पर इति न भ्रमितव्यम्, परस्य हिंसाप्रसंगाभावात्, जीवादितरस्य तद्भोग्यभोगोपकरण भूतस्य कृत्स्नस्याचिद् वस्तुनो जीवायत्तस्थिति- त्वेन प्रत्यगात्मन्येवारनाभि दृष्टान्तोपपत्तेश्च अयमेव च प्राणशब्द निर्दिष्टो भूमा “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इति प्रतिवचनस्य `चाभा