भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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तदारंभाय च प्राप्यभूत प्राण शब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्मस्वरूपस्य सुखरूपताज्ञानमुपदिश्य तस्य च सुखस्य विपुलता “भूमात्वेव विजि- ज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्यते तदेवं प्रत्यगात्मन एवाविद्यावियुक्तं रूपं विपुलसुखमित्युपदिष्टमिति “तरतिशोकमात्मवित्” इत्युपक्रमा- विरोधश्च अतोभूमगुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा, यत एवं भूमगुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा अतएवाहमर्थेप्रत्यगात्मनि “अहमेवाधस्तादह मुपरिष्टात्” इत्यारभ्य “अहमेवेदं सर्वम्” इति प्रत्यगात्मनो वैभव- मुपदिशति । एवं प्रत्यगात्मत्वे निश्चिते सति तदनुगुणतया वाक्यशेषो नेतव्य इति । प्रसंगतः प्राणविद को अतिवादी बतलाकर “जो सत्यवादी है वही अतिवादी है” इत्यादि में अतिवादी का ही सत्यवादी रूप से पुनरुल्लेख किया गया है। सत्यवादिता का, प्राणोपासना के अंगरूप से उपदेश दिया गया है। “जो इसे विशेष रूप से जान लेता है, तभी सत्य बोलता है” इत्यादि में अवलंबनीय, सत्यवादिता के अंगी प्राण के, यथार्थ तत्त्व विज्ञान का उपदेश दिया गया है। तथा सत्यवादिता के साधन स्वरूप मन, श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रयत्न का उपदेश दिया गया है। उक्त तथ्य का ही उपक्रम करते हुए, प्राप्यभूत प्राणशब्द निर्दिष्ट जीवात्मा के स्वरूप की सुख- रूपता ज्ञान का उपदेश देकर उसकी सुख विपुलता “भूमा ही ज्ञातव्य है” इत्यादि में भूमा रूप से ज्ञातव्य बतलाई गई। इससे ज्ञात होता है कि—अविद्या रहित-शुद्ध जीवात्मा के स्वरूप को ही विपुल सुख रूप से उपदेश दिया गया है। “आत्मवेत्ता शोक से छूट जाता है” इत्यादि से उक्त उपक्रम का अविरोध ज्ञात होता है। इससे निश्चित होता है कि भूमागुण विशिष्ट जीवात्मा ही है। ऐसे भूमागुण विशिष्ट जीवात्मा के अहमर्थ का भी “मैं ही ऊपर मैं ही नीचे” से लेकर “मैं ही सब कुछ हूं” तक भूमात्व बतलाया गया है। इस प्रकार जीवात्मा का भूमात्व निश्चित हो जाने पर, वाक्य शेष का भी तदनुरूप ही अर्थ करना चाहिए। सिद्धान्तः—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—भूमासंप्रसादादध्युपदेशात्— भूमगुण विशिष्टो न प्रत्यगात्मा, अपितु परमात्मा, कुतः ? संप्रसा-

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