भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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श्रुति में—देवादि जीवों के अनायास आश्रय के लिए, परंपुरुष परमेश्वर स्वकीय विशेषताओं सहित, स्वेच्छा से विभिन्न जातीय रूप-आकृत-गुण और कर्मों से समन्वित होकर अनेक जन्म धारण करते हैं। ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। स्मृति में भी जैसे—“अजन्मा और अव्यय समस्त भूतों का स्वामी मैं अपनी प्रकृति के साहाय्य से अपनी माया के प्रभाव से अनेक रूपों में प्रकट हो जाता हूँ'' इस प्रकार जीव के भोगोपकरण मन आदि की आश्रयता और सर्वाधारकता, परब्रह्म की ही बतलाई गई है। इतश्च परमपुरुषः—इसलिए भी परंपुरुष आयतन हैं कि— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च ।१।३।२॥ अयं द्युपृथिव्याद्यायतनभूतः पुरुषः संसारबंधान्मुक्तै रपि प्राप्यतया व्यपदिश्यते “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयो- निम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति” “यथानद्यः स्यदमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्” इति । संसारबंधनाद् विमुक्ता एव हि विधूतपुण्यपापा निरंजना नाम- रूपाभ्यां विनिर्मुक्ताश्च । पुण्यपापनिबंधनाचित् संसर्ग प्रयुक्तनामरूप- भाक्त्वमेव हि संसारः । अतो विधूतपुण्यपापैः निरंजनै प्रकृतिसंसर्ग रहितैः परेण ब्रह्मणा परमं साम्यमापन्नैः प्राप्यतया निर्दिष्ट द्यु पृथिव्याद्यानभूतः, परंब्रह्मैव । सांसारिक बंधनों से मुक्त जीवों के लिए भी, स्वर्ग पृथ्वी आदि के आयतन परंपुरुष ही प्राप्य कहे गए हैं—“जब यह द्रष्टा (जीवात्मा) सब के शासक ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परं पुरुष का प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्यपाप दोनों से मुक्त, निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता प्राप्त कर लेता है”—जैसे कि बहती हुई नदियाँ, नाम रूप छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा, नामरूप रहित होकर, उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है । “अर्थात् जो सांसारिक