श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस पर संशय होता है कि-द्युभू आदि का आयतन, जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह सकते हैं कि-जीवात्मा है-क्यों कि-'रथकी नाभि में जुड़े हुए अरों की भांति, जिसमें समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ एकत्र स्थित है, वह बहुत प्रकार से उत्पन्न होने वाला, मध्य भाग में रहता है" इस बाद के श्लोक में, पूर्व श्लोक में प्रस्तुत द्युपृथिवी आदि के आयतन को ही "यत्र" शब्द से पुनः नाड़ियों का आधारभूत बतलाकर पुनः"स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः" से उसी का अनेक रूपों में उत्पन्न होना बतलाया गया है। नाड़ियों से संबंधित, देहादि रूप से प्रायः जन्म लेना, जीव का ही धर्म है । पूर्व श्लोक में "मनस्सह प्राणैश्च सर्वैः" इत्यादि में, पंचप्राण समन्वित मनको जिसका आश्रय कहा गया है वह भी जीव ही प्रतीत होता है, क्योंकि, यह भी जीव का ही धर्म है । इस प्रकार जीवत्व के निश्चित हो जाने पर, द्युपृथिवी आदि का आयतन, जीव को ही मानना संगत होगा । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—द्युभ्वाद्यायतनंस्वशब्दात्- द्युपृथिव्यादीनामायतनं परं ब्रह्म, कुतः ? स्व शब्दात्—परब्रह्मासा- धारण शब्दात् । “अमृतस्यैष सेतुः" इति परस्य ब्रह्मणोऽसाधारण शब्दः । “तमेवं विद्वान् अमृत इह भवति, नान्यः पन्था अयनाय विद्यते" इति सर्वत्रोपनिषत्सु स एवामृतत्वप्राप्ति हेतुः श्रूयते । सिनोतेश्च बधनार्थत्वात् सेतुः, अमृत्य प्रापक इत्यर्थः. सेतुरिव वा सेतुः-नद्यादिषु सेतुर्हि कूलस्य प्रतिलम्भकः, संसाराणर्वपारभूतस्यामृ- त्येष प्रतिलम्भक इत्यर्थः । द्युभू आदि के आयतन परमात्मा ही हैं, क्यों कि-उक्त प्रसंग में परब्रह्म के द्योतक असाधारण विशेषणों का प्रयोग किया गया है । “अमृत का सेतु" शब्द परब्रह्म की असाधारण विशेषता का द्योतक है । "उनके इस रूप को जानकर इस लोक में ही अमृत हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त जीवनयात्रा का कोई दूसरा मार्ग नहीं है" इत्यादि उपदेश प्रायः सभी उपनिषदों में दिया गया है, जिसमें परमात्मा को ही अमृतत्व प्राप्ति का हेतु बतलाया गया है । 'सिञ्.' धातु का बंधन अर्थ होने से सेतु शब्द का