श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४६ ) किंचिदज्ञातमिति इति विज्ञाय ज्ञाताज्ञातांश बुभुत्सया तानेकैकं प्रपच्छ । तत्र “औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्से” इति पृष्टे “दिवमेव भगवो राजन्” इति तेन चोक्ते दिवितस्य पूर्णं वैश्वा- नरात्म बुद्धिं निवर्तयन् वैश्वानरस्य द्यौर्मूर्धेति चोपदिशंस्तस्या वैश्वानरांशभूताया दिवः सुतेजा इति गुणनामधेयं प्राचिख्यपत् । उक्त स्मृतिवाक्य में भी द्युलोक आदि को वैश्वानर के अंगों के रूप में वर्णन किया गया है। उन उपमन्यु आदि महर्षियों द्वारा “आप वैश्वानर आत्मा के ज्ञाता हैं, उन्हीं का उपदेश करे” ऐसा पूछने पर कैकय राज विश्वपति ने, वैश्वानर तत्त्व के उपदेश की इच्छा से, बिना कुछ सामान्य ज्ञान हुए, विशेष तत्त्व का ज्ञान हो नहीं सकता ऐसा विचार कर, ये लोग आत्मतत्त्व को कितना जानते है कितना नहीं, इसको जानने के लिए, उन लोगों में से प्रत्येक से अलग-अलग प्रश्न किया। “उपमन