श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४५ ) शब्द प्रकारवाची है । प्रत्यभिज्ञा का विषय ऐसे रूप वाला वैश्वानर शब्द, परमात्मा का ज्ञापक है । श्रुति स्मृति में ऐसा रूप परमात्मा का ही प्रसिद्ध है । यथा आथर्वणे—"अग्निर्मूर्धा, चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशःश्रोत्रे, वाग्विवृताश्च वेदाः; वायु प्राणो हृदयंविश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा" इति । अग्निरिह द्युलोकः "असौ वैलोकोऽग्निः" इति श्रुतेः । स्मरंति च मुनयः—"द्यांमूर्धानं यस्य विप्रावदंति खं वै नाभि चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे, दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौक्षिति च सोऽचिंत्यात्मा सर्वभूत प्रणेता "इति" यस्याग्निरास्यं द्यौ मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः सूर्यश्चक्षुः दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ।" इति च । जैसा कि आथर्वण संहिता में—"इस परमेश्वर का मस्तक अग्नि, नेत्र सूर्य और चंद्रमा, कान दिशायें, वाणी वेद, प्राण वायु, हृदय विश्व है, इसके दोनों पैरों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है, यही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है ।" इस वाक्य में अग्नि का अर्थ द्युलोक है जैसा कि— "यह द्युलोक अग्नि स्वरूप है" इस श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है । महामुनि वेदव्यास जी ने भी ऐसे ही रूप का स्मरण किया है— "विद्वद्गण द्युलोक को जिनका मस्तक, आकाश को नाभि, सूर्यचन्द्र को नेत्र, दिशाओं को कर्ण, एवं पृथ्वी को चरण बतलाते हैं, वे ही अचिन्त्य सर्वान्तर्यामी परमात्मा हैं।" तथा—"अग्नि जिनका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी चरण, सूर्य नेत्र, दिशायें कान हैं, उन लोकात्मा को प्रणाम है ।" इत्यादि । इह च द्युप्रभृतयो वैश्वानरस्य मूर्धाद्यवयवत्वेनोच्यन्ते । तथाहिं- तैरौपमन्यवप्रभृतिभिर्महर्षिभिः "आत्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्ये- षितमेव नो ब्रूहि' इति पृष्टः कैकेयस्तेभ्यो वैश्वानरात्मानमुपदि- दिक्षुः विशेषपृश्नान्यथानुपपत्या वैश्वानरात्मन्येतैः किंचिद् ज्ञातं ankurnagpal108@gmail.com