भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 493

( ४३३ ) एवं प्राप्ते ब्रूमः—अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः, अदृश्यत्वादि गुणकोऽक्षरात्परतः परश्च परमपुरुष एव, कुतः ? तद्धर्मोक्तेः । “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” इत्यादिना सर्वज्ञत्वादिकाः तस्यैव धर्मा उच्यन्ते तथा हि—“ययातदक्षरमधिगम्यते” इत्यादिना अदृश्यत्वादिगुणकम- क्षरमभिधाय ‘अक्षरात् संभवतीहविश्वम्’ इति तस्मात् विश्व- संभवं चाभिधाय “यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः, तस्मादेतद् ब्रह्मनाम रूपमन्नं च जायते” इति भूतयोनेरक्षरस्य सर्वज्ञत्वादिः प्रतिपाद्यते । पश्चात् “अक्षरात्परतः परः” इति च प्रकृति- मदृश्यत्वादिगुणक भूतयोन्यक्षरं सर्वज्ञमेव परत्वेन व्यपदिश्यते । अतः “अक्षरात् परतः परः” इत्यक्षर शब्दः पंचम्यन्तः प्रकृतमदृश्य- त्वादिगुणकमक्षरं नाभिधत्ते, तस्य सर्वज्ञस्य विश्वयोनेः सर्वस्मात् परत्वेन तस्मादन्यस्य परत्वासंभवात् । अतोऽन्नाक्षरशब्दो भूत सूक्ष्ममचेतनं ब्रूते । उक्त संशय पर वक्तव्य यह है कि—अदृश्यत्वादि गुण अक्षर से परतत्त्व, परमात्मा के ही धर्म कहे गये हैं । तथा “जो सर्वज्ञ सर्वविद्” इत्यादि से सर्वज्ञता आदि धर्म भी उन्ही के बतलाए गए हैं । वैसे ही— “जिससे अक्षर अधिगत होता है” इत्यादि से अदृश्यत्व गुणवाले अक्षर का वर्णन करके “अक्षर से सारा विश्व होता है” इत्यादि से उस अक्षर से विश्व की उत्पत्ति बतलाकर “जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, ज्ञानमयता ही जिसका तप है उससे ही ब्रह्म, नाम, अन्न (पृथ्वी) और रूप उत्पन्न होते हैं” इत्यादि में भूतयोनि अक्षर की सर्वज्ञता आदि का प्रतिपादन किया गया है । “वह पर अक्षर से भी, पर है” इस वाक्य में भूतयोनि अदृश्यता आदि गुणवाले सर्वज्ञ अक्षर को ही, पर रूप से प्रतिपादन किया गया है । “अक्षरात् परतः” में अक्षर शब्द पंचम्यन्त कहा गया है जिससे ज्ञात होता है कि-यह वाक्य अदृश्यत्व आदि गुण वाले अक्षर का बोधक नहीं है । पर शब्द उस सर्वज्ञ विश्वयोनि की ओर इंगन कर रहा है जो कि सब से श्रेष्ठ है उससे अधिक कोई और श्रेष्ठ नहीं हो सकता ।