श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३० ) न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापाच्छारीरश्च ।१।२।२०॥ स्मार्त्तं प्रधानम्, शारीरः जीवः स्मार्त्तं च शारीरश्च नान्तर्यामी, अतद्धर्माभिलापात्—तयोरसंभावितधर्माभिलापात् । स्वभावत एव सर्वस्य द्रष्टृत्वम्, सर्वस्य नियन्तृत्वं, सर्वस्यात्मत्वं, स्वतएवामृत- त्वम् च तयोर्नसंभावनागंधमर्हति । एतदुक्तं भवति, यथास्मार्तम- चेतनं, सर्वज्ञत्वनियंतृत्वसर्वात्मत्वादिकं नार्हति, तथा जीवोऽपि; अतद्धर्मत्वादिति । सांख्य स्मृति प्रतिपाद्य प्रधान (माया) और शारीर जीवात्मा, अन्तर्यामी नहीं हैं क्यों कि उन दोनों में वे विशेषतायें नहीं हैं जो कि अन्तर्यामी के लिए वेदांत वाक्यों में कही गई हैं। स्वाभाविक ही सर्व- दर्शन शक्ति, सर्व नियंत्रण शक्ति, सर्वात्मकता, और स्वाभाविक अमरता का इन दोनों में नितान्त अभाव है । कथन यह है कि-जैसे कि प्रधान अचेतन प्रकृति में सर्वज्ञत्व, नियंतृत्व सर्वात्मत्व आदि की अर्हता नहीं है वैसे ही चैतन्य जीव में भी नहीं है, ये विशेषतायें उसमें भी नहीं हैं । अमीषां गुणानां परमान्वयः, प्रत्यगात्मनिव्यतिरेकश्च सूत्रद्वयेन दर्शितः । उक्त विशेषताओं का परमात्मा में अन्वय तथा जीवात्मा में अभाव दो सूत्रों में दिखलाया गया है । उभयेऽपिहिभेदेनैनमभिधीयते ।१।२।२१॥ उभये माध्यन्दिनाः काण्वाश्च, अन्तर्यामिणोनियम्यत्वेन वागादिभिरचेतनैः समम् एनं, शारीरमपि विभज्याधीयते—“य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरोयमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति माध्य- न्दिनाः; ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यादि काण्वाः परमात्मनियाम्य- तया तस्माद् विलक्षणत्वेनैनमभिधीयत इत्यर्थः । अतोऽन्तर्यामी ankurnagpal108@gmail.com