भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४२६ ) स्वाभाविक अमरता, परमात्मा की ही विशेषता है। परमात्मा में, देखना सुनना इत्यादि क्षमतायें इन्द्रियाधीन नहीं हैं अपितु सर्वज्ञ और सत्यसंकल्प होने से ये सारी क्षमतायें उनमें स्वाभाविक रूप से रहती हैं। जैसा कि-‘बिना नेत्र के ही देखते है, बिना कान के ही सुनते हैं' बिना हाथ और पैर के ही पकड़ते और चलते हैं" इस श्रुति वाक्य से भी सिद्ध है। देखना सुनना इत्यादि शब्द एकमात्र आँख कान इत्यादि इन्द्रिय जन्य ज्ञान के ही बोधक हों, ऐसा नहीं है, अपितु रूपादि विषयक साक्षात्कार के बोधक भी हैं। जीव की स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, स्वीय कर्म संस्कारों से आवृत्त रहती है इसीलिए उसे इन्द्रियों की अपेक्षा होती है। किन्तु परमात्मा स्वभाव से ही कर्मादिजन्य दोषों से रहित है, इसलिए उन्हें सदा स्वाभाविक ज्ञान रहता है। “इनसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है" इत्यादि श्रुति भी पूर्व वाक्योक्त-नियंता द्रष्टा को कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है इसी का समर्थन करती है। “यं पृथिवी न वेद" यमात्मा न वेद “इत्येवमादिभिर्वाक्यैः पृथिव्यात्मादिनियाम्यैरनुपलाभ्यमान एव नियमयतीहि यत्पूर्वमुक्तम् तदेव” अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता “इति निगमय्य” नान्योऽतो- ऽस्ति द्रष्टा “इत्यादिना तस्य नियन्तुर्नियन्त्रन्तरं निषिध्यते ।” एष त आत्मा—“सत आत्मा” इति च त इति व्यतिरेकविभक्ति- निर्दिष्टस्य जीवस्यात्मतयोपदिश्यमानोऽन्तर्यामी न प्रत्यगात्मा भवितुमर्हति । “पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती" आत्मा जिन्हें नही जानता “इत्यादि वाक्यों से उन्हीं का उल्लेख है जिन्हें पूर्व वाक्यो में पृथ्वी आत्मा आदि का नियामक कहा गया है, उन्हें ही आगे “स्वयं अदृश्य होकर देखते है तथा अश्रुत होकर सुनते है” इत्यादि में अलौकिक बतलाकर “उनके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नही है” इत्यादि से उनकी अनन्य नियंतृता सिद्ध की गई है । ‘यह तुम्हारा आत्मा है—वह तुम्हारा, आत्मा है” इत्यादि में आत्मा से भिन्न विभक्ति का प्रयोग करके जीवात्मा की भिन्नता स्पष्ट कर दी गई है इसलिए जीवात्मा कदापि अन्तर्यामी नहीं हो सकता । ankurnagpal108@gmail.com