श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थानों पर उल्लेख किया गया है। जो स्वयं एक होकर भी, समस्त लोक, समस्त भूत और समस्त देवताओं का नियमन करते हैं। इत्यादि । तथा उद्दालक प्रश्नः “इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति” इत्युपक्रम्य “तमन्तर्यामिणंब्रूहि” इति तस्य चोत्तरम् “यः पृथिव्यां तिष्ठन्” इत्यारभ्योक्तम्। तदेतत् सर्वांल्लोकान्, सर्वाणि च भूतानि, सर्वान् देवान्, सर्वान् वेदान्, सर्वांश्चयज्ञानन्तः प्रविश्य, सर्वंप्रकारनियमनम्, सर्वशरीरतया सर्वस्यात्मत्वं च सर्वज्ञात् सत्यसंकल्पात् पुरुषोत्तमादन्यस्य न संभवति। इसी प्रकार उद्दालक प्रश्न के प्रकरण में जैसे-“जो अन्तर्यामी होकर इहलोक परलोक और समस्त भूतों का संयमन करते है” ऐसा उपक्रम करके “उन अन्तर्यामी के विषय में बतलावें” ऐसा प्रश्न करने पर “जो पृथिवी में है” इत्यादि उत्तर दिया गया। इससे ज्ञात होता है कि-समस्त लोक, समस्त भूत समुदाय, समस्त देवता, समस्त वेद, समस्त यज्ञ के अन्तर्यामी, हर प्रकार से सबका नियमन करने वाले, सर्व शरीर, सर्वात्मा सर्वज्ञ सत्य संकल्प, एक मात्र पुरुषोत्तम ही हो सकते हैं। तथाहि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा”-“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य, सच्चत्यच्चाभवत्” इत्यादीन्यौप- निषदानि वाक्यानि परमात्मन एव, सर्वस्य प्रशासितृत्वं सर्वस्या- त्मत्वं इत्यादीनि वदंति । इसी प्रकार-“सर्वात्मभूत परमेश्वर अभ्यंतर में प्रवेश कर समस्त जनों का शासन करते हैं”-“वे सृष्टि करके उसी में प्रविष्ट हो गए, प्रविष्ट होकर वे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप वाले हुए” इत्यादि औपनिषद् वाक्य, परमात्मा की ही सर्वशासकता और सर्वान्तर्यामिता इत्यादि बतलाते हैं। तथा सुबालोपनिषदि-“नैवेह किंचनाग्र आसीदभूतमनाधारं- मिमाः प्रजाः प्रजायंते दिव्योदेव एको नारायणः, चक्षुश्च द्रष्टव्यं