भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४२६ ) ही शरीर वाले, उनके नियंता आदि रूप से उन्हे बतलाकर “वे ही अमृत स्वरूप अन्तर्यामी तुम्हारे आत्मा हैं।” ऐसा उपदेश दिया गया है। माध्यन्दिन के पाठ में—“जो समस्त लोको में स्थित हैं, जो समस्त वेदों में स्थित हैं, जो समस्त यज्ञों में स्थित हैं” इत्यादि पर्याय विशेष है। “जो विज्ञान में स्थित है” के स्थान पर “जो आत्मा में स्थित है” ऐसा पर्यायवाची वाक्य प्रयोग किया गया है। “वह अमृत स्वरूप अन्तर्यामी तुम्हारे आत्मा हैं” यह विशेष वाक्य दोनों में ही मिलता है। इस पर संशय होता है कि–यह अन्तर्यामी, जीव है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि–जीवात्मा है, क्यों कि–उक्त वाक्य के अंत में अन्तर्यामी का ज्ञान इन्द्रियाधीन है, ऐसा “द्रष्टा श्रोता” इत्यादि विशेषणों से ज्ञात होता है। द्रष्टा को ही अन्तर्यामी कहा गया है तथा उसके अतिरिक्त कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है।” ऐसा निषेध किया गया है इत्यादि से जीवात्मा ही सिद्ध होता है। एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषु तद्धर्म- व्यपदेशात् अधिदैवाधिलोकादिपदचिह्नितेषु वाक्येषु श्रूयमाणोऽन्त- र्याम्यपहतपाप्मा परमात्मा नारायणः। काण्वपाठसिद्धेभ्योऽधिदै- वादिमद्भ्यो वाक्येभ्योऽधिकान्यधिलोकादिमन्ति वाक्यानि माध्य- न्दिनपाठे सन्तीति ज्ञापनार्थमधिदैवाधिलोकादिष्वित्युभयोरुपादानम्। तदेवमुभयेष्वपि वाक्येष्वन्तर्यामी परमात्मेत्यर्थः। कुतः ? तद्धर्म- व्यपदेशात् परमात्मधर्मोह्ययम्, यदेक एव सन् सर्वलोकसर्वभूत सर्वदेवादीन् नियमयति इति। उस संशय पर कहते हैं कि–अधिदैव और अधिलोक आदि वाक्यों में कहे गए अन्तर्यामी, निष्पाप परमात्मा नारायण ही हैं। काण्वशाखा के पाठ के अनुसार अधिदैवादि युक्त वाक्य की अपेक्षा माध्यन्दिन पाठ में अधिलोकादि युक्त पाठ अधिक है, इसके ज्ञापन के लिए ही सूत्र में अधिदेव के बाद अधिलोक शब्द का उल्लेख किया गया है। इन दोनों ही स्थानों के अन्तर्यामी परमात्मा ही हैं। उनके ही धर्मों का, दोनों ankurnagpal108@gmail.com