श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६० ) मरणोत्तर उसकी तदनुसार ही गति होती है, वह पूर्वजन्मानुसार ही आगे भी संकल्प करता है, उसका मनोमय प्राण शरीर ज्योति रूप है ।'' इत्यादि वाक्य के “वह संकल्प करता है” इस वाक्यांश में प्रतिपादित उपासना के उपास्य को “मनोमय प्राण शरीर” रूप से बतलाया गया है । तत्र संशयः-किं मनोमयत्वादिगुणकक्षेत्रज्ञः उत् परमात्मा इति ? इस पर संशय होता है कि-मनोमय आदि गुणों वाला जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? किं युक्तम् ? क्षेत्रज्ञ इति । कुत ? मनःप्राणयोः क्षेत्रज्ञोपकर- णत्वात्, परमात्मनस्तु “अप्राणो ह्यमनाः” इति तत्प्रतिषेधाच्च न च “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति पूर्वनिर्दिष्टं ब्रह्मात्रोपास्यतया संबद्धुं शक्यते । “शान्त उपासीत” इत्युपासनोपकरण शान्तिनिवृ- त्त्युपायभूतब्रह्मात्मकत्वोपदेशायोपात्तत्वात् । क्षेत्रज्ञ ही हो सकता है, क्यों कि मन और प्राण जीवात्मा के ही उपकरण हैं । परमात्मा को तो “अप्राण अमन” इत्यादि वाक्यों में प्राण मन रहित बतलाया गया है । 'यह सारा जगत ब्रह्म है” इस पूर्व वाक्य निर्दिष्ट ब्रह्म ही यहाँ उपास्य रूप से बतलाए गए हों, ऐसा भी नहीं है”; शांत भाव से उपासना करो “इस वाक्य में उपासना की सहायिका शांति बतलाई गई है तथा ब्रह्मात्मैकत्व प्राप्ति के उपाय के रूप से शांति संपादन का उपदेश दिया गया है [ अर्थात् मन में शान्ति का आश्रय है इसलिए आश्रय रूप मन ही उपासना का उपकरण सिद्ध होता है यदि मन को परमात्मा मानलेंगे तो साध्य साधन की एकता सिद्ध होगी, जो कि अनियमित बात है ] न च “सक्रतुं कुर्वीत” इत्युपासनस्योपास्यसाकांक्षत्वाद् वाक्यां- तरस्थमपिब्रह्म संबद्ध्यत इति युक्तं वक्तुं, स्ववाक्योपात्तेन मनो- मयत्वादिगुणेन निराकांक्षत्वात् । “मनोमयः प्राण शरीरः” इत्य-