श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८६ ) प्रमाण सम्बन्धी समस्त संभावनाओं से अतीत, सर्वज्ञ, सत्य संकल्प, अपरिमित उदारगुणों के सागर समस्त पदार्थों से विलक्षण परब्रह्म पुरुषोत्तम नारायण ही वेदांत वेद्य हैं, ऐसा कहा गया । अतः परं द्वितीय-तृतीयचतुर्थेषुपादेषु यद्यपि वेदांतवेद्यं ब्रह्मैव, तथापि कानिचिद् वेदांतवाक्यानि प्रधानक्षेत्रज्ञान्तर्भूत वस्तुविशेषस्वरूपप्रतिपादनपराण्येवेत्याशंक्य तन्निरसनमुखेन तत्तद्- वाक्योदितकल्याणगुणाकरत्वं ब्रह्मणः प्रतिपाद्यते । इसके बाद अग्रिम दूसरे तीसरे और चौथे पाद में यद्यपि वेदांत- वेद्य ब्रह्म का प्रतिपादन किया जावेगा, तथापि कुछ वेदांत वाक्य, प्रकृति और क्षेत्रज्ञ (जीव) का प्रतिपादन करते हुए से दीखते हैं, इस संशय का निराकरण करके, कल्याणमय गुणों के धाम ब्रह्म ही उन वाक्यों के प्रति- पाद्य हैं, ऐसा दिखलाया जावेगा । तत्रास्पष्टजीवादिलिंगकानिवाक्यानि द्वितीयेपादे विचार्यन्ते, स्पष्टलिंगकानितृतीये, तत्तत्प्रतिपादनच्छायानुसारिणि चतुर्थे । अस्पष्ट जीवादि लिंगक वाक्यों का द्वितीय पाद में, स्पष्ट जीवादि लिंगक वाक्यों का तृतीयपाद में तथा जीवादि प्रतिपादक वाक्यों के से आभास युक्त वाक्यों का चतुर्थपाद में विचार किया गया है । १ अधिकरण— सर्वत्रप्रसिद्धोपदेशात् । १।२।१॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये “अथखलुक्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुर- स्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत मनो- मयः प्राणशरीरः भारूपः” इत्यादि । अत्र “स क्रतुंकुर्वीत” इति प्रति- पादितस्योपासनस्योपास्यः “मनोमयः प्राणशरीरः” इति निर्दिश्यत इति प्रतीयते । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि—“पुरुष निश्चय ही क्रतुमय ( संकल्प प्रधान ) होता है इस लोक में बह जैसा संकल्प करता है,