श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४६ ) भाव और असद्भाव का निराकरण तो प्रमाणान्तरों पर आधारित होता है, पर इसमें प्रमाणान्तरों से अभाव की ही प्रतीति होती है "अपहत- पाप्मा" इत्यादि प्रमाण दुःख के अभाव के ही परिचायक हैं, यहाँ केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि—ब्रह्मानंद की जो प्रभूतता है वह अन्यान्य आनंदों से अपेक्षाकृत श्रेष्ठ, है उसके समक्ष सारे आनंद अल्प हैं—इसके लिए कहा भी गया है कि—"मानुष आनंद एक अंश मात्र है।" जीव नद की अपेक्षा ब्रह्मानंद अत्यन्त आनंदपूर्ण हैं। यच्चोक्तं जीवस्यानंदविकारत्वं संभवतीति, तदपि नोपपद्यते, जीवस्य ज्ञानानन्दस्वरूपस्य केनचिदाकारेण मृद इव घटाद्या- कारेण परिणामः सकल श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धः संसारदशायां तु कर्मण ज्ञानानंदौ सकुचितावित्युपपादयिष्यते। अतश्चानन्दमयो जीवादन्यः परब्रह्म । जो यह कहते हो कि—जीव की विकारता ही संभव है सो यह कथन भी असंगत है, मिट्टी का जैसा घट आदि आकार वाला विकृत परिणाम होता है, वैसा ज्ञान और आनंद स्वरूप जीव का भी संभव हो, ऐसा श्रुति स्मृति और युक्ति से विरुद्ध है। संसार दशा में कर्म से, ज्ञान और आनंद संकुचित हो जाते हैं, इसका विवेचन आगे करेंगे। जीव से भिन्न परमात्मा ही आनंदमय है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः परंब्रह्म इसलिए भी जीव से भिन्न परब्रह्म आनंदमय है कि— तद्धेतुव्यपदेशाच्च १।१।१५। “को ह्येवान्यात् को प्राण्यात् यदेष आकाश आनंदो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति” इति। एष एव जीवानन्दयतीति। जीवानन्द हेतुरयं व्यपदिश्यते। अतश्चानन्दयितव्याज्जीवादानंदयिताऽयमन्य आनंदमयः परमात्मेति विज्ञायते। आनंदमय एवात्र आनंद शब्देनो- क्त इति चानन्तरमेव वक्ष्यते। ankurnagpal108@gmail.com