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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३४७ ) “यदि यह आकाश (ब्रह्म) आनंद (जीवान्तरवर्त्ती दहराकाश) न होता तो कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता” इस उदाहरण से ज्ञात होता है कि—परमात्मा ही जीवो के आनंद का हेतु और जीवों का आनंददाता है। आनंद करने वाले जीवात्मा से, आनंद- दाता ब्रह्म भिन्न ही है, जो कि—आनंदमय शब्द से जाना जाता है। उक्त उदाहरण में आनंद शब्द से आनंदमय की ही व्याख्या की गई है, और उसकी भिन्नता बतलाई गई है। इतश्च जीवादन्य आनंदमयः— इसलिए भी आनंदमय जीव से भिन्न है कि— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते १।१।१६ “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति मंत्रवर्णोदितं ब्रह्मैवानंदमय इति गीयते । तत्तु जीवस्वरूपादन्यत् परंब्रह्म “ब्रह्म विदाप्नोति परं” इति जीवस्य प्राप्यतया ब्रह्म निर्दिष्टम् । ‘ सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इस मंत्र में उल्लेख्य ब्रह्म को ही बार-बार “आनंदमय” नाम से बतलाया गया है। इसलिए जीव स्वरूप से भिन्न परब्रह्म है, ऐसा निश्चित होता है। “ब्रह्मवेत्ता ही परब्रह्म को प्राप्त करता है” इस मंत्र में भी जीव के प्राप्य ब्रह्म का निर्देश किया गया है। “तदेषाभ्युक्ता” इति तत् ब्रह्म अभिमुखीकृत्य प्रतिपाद्यतया परिगृह्य, ऋगेषा अध्येतृभिरुक्ता । ब्राह्मणोक्तस्यार्थस्य वैशद्यमनेन मंत्रेण क्रियत इत्यर्थः, जीवस्योपासकस्य प्राप्यं ब्रह्म तस्माद् विलक्षणमेव अनंतरंच “तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” इत्यारभ्य उत्तरोत्तरैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रैश्च तदेव विशदो क्रियते । अतो जीवादन्य आनंदमयः । “तदेषाभ्युक्ता” ( तत् = ब्रह्म को अभिमुख करके एषा = ऋक् मन्त्र + उक्ता = पाठकों द्वारा कहा गया ) इस मंत्र में ब्रह्म को प्रतिपाद्य ankurnagpal108@gmail.com

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