श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४८ ) मानकर पाठकों ने उसका विश्लेषण किया है यह मंत्र उपरोक्त ब्राह्मण मंत्र का ही परिष्कृत अर्थ है। इससे निश्चित होता है कि—उपासक जीव का उपास्य ब्रह्म जीव से निश्चित ही विलक्षण है। अन्य प्रकरण में भी जैसे—'इसी आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से प्रारंभ करके उत्त- रोत्तर ब्राह्मण और वैदिक मंत्रों में इसी तथ्य को विशद किया गया है इसलिए जीव से भिन्न ही आनंदमय है, ऐसा सिद्ध होता है। अत्राह-यद्यप्युपासकात्प्राप्यस्य भेदेन भवितव्यम् । तथापि न वस्त्वंतरं जीवान्मान्त्रवर्णिकं ब्रह्म, किन्तु तस्यैवोपासकस्य निरस्त- समस्ताविद्यागंधनिविशेषचिन्मात्रैकरसंशुद्ध'स्वरूपं तदेव "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति मंत्रेण विशोध्यते । तदेव च "यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" इति वाङ्मनसागोचरतया निर्वि- शेषमिति मन्यते । अतस्तदेव मांन्त्रवर्णिकमिति तस्मादनतिरिक्त आनन्दमय इति । अत उत्तरं पठति— उक्त मत पर विपक्षी कहते हैं कि—उपासक से उपास्य का भेद होना चाहिए परन्तु मंत्रोक्त ब्रह्म, जीव से भिन्न नहीं है, उपासक का जो अविद्या रहित निर्विशेष चिन्मात्र एकरस शुद्ध स्वरूप है उसी को "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" मंत्र द्वारा बतलाया गया है। उसी का "यतो वाचो" आदि मंत्र से अवाङ् मनस अगोचर प्रतिपादन किया गया है, शुद्धावस्था- पन्न जीव ही मंत्रों का प्रतिपाद्य है, उससे भिन्न कोई अन्य आनंदमय नहीं है। इस कथन का उत्तर देते हैं— नेतरोऽनुपपत्तेः १।१।१७ परमात्मन इतरो जीवशब्दाभिलप्यो मुक्तावस्थोऽपि न भवति मांन्त्रवर्णिकः । कुतः ? अनुपपत्तेः । तथाविधस्यात्मनो निरुपाधिकं विपश्चित्वं "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इति सत्यसंकल्पत्व प्रदर्शनेन विवरिष्यते । विविधं पश्यंश्चित्वं हि विपश्चित्त्वम् ।