श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३६ ) अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर देवता आदि जीवों और स्वयं अपने भी नामरूप को व्यक्त किया। अर्थात् जड़ चेतन और ईश्वरात्मक जगत् समष्टि की सत्ता की वस्तुता और शब्दवाच्यता का संपादन किया। ‘इस जीवात्म रूप में अपने को ही’ इत्यादि श्रौतवाक्य में भी जीव का ब्रह्मात्मभाव दिखलाया गया है। जीवान्तरात्मा के रूप में ब्रह्म के अनु- प्रवेश से ही जीव के ब्रह्मात्म भाव का स्पष्ट ज्ञान होता है। जैसा कि- श्रौतवाक्यों से भी स्पष्ट है—‘सृष्टि करके वे उसी में प्रविष्ट हो गए” “प्रविष्ट होकर वे सत् और त्यत् हो गए” इत्यादि। यहाँ “इदं सर्वम्” का तात्पर्य जड चेतन दोनों से है। सत् और त्यत् शब्द से भी विज्ञान और अविज्ञान के भेद को बतला कर चिद् (जीव) में ब्रह्म के अनुप्रवेश का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि-नाम रूप के बोधक सारे शब्द, अचित् जीवविशिष्ट परमात्मा के बोधक हैं। किञ्च “ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इति चेतन मिश्रं प्रपंचं इदं सर्वमिति निर्दिश्य “तस्यैष आत्मा” इति प्रतिपादितम्। एवं च सर्वचेतनाचेतनंप्रति ब्रह्मण आत्मत्वेन सर्वं अचेतनं जगत् तस्य- शरीरं भवति। तथा च श्रुत्यन्तराणि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम् यः पृथिवीमन्तरो यमयति। स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः “इति आरभ्य” य आत्मनि तिष्ठन् आत्म- नोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽत्मा शरीरम्, य आत्मानमंतरो यमयति, स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्यादि। “यः पृथिवीमंतरे संचरन्, यस्य पृथिवी शरीरम्। योऽपामन्तरे संचरन् यस्यापश्- शरीरं” इत्यारभ्य ‘योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरम्, यमक्षरं न वेद, एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” इत्यादीनि सचेतनं जगत् तस्य शरीरत्वेन निर्दिश्य तस्यात्मत्वेन परमात्मानमुपदिशन्ति, अतश्चेतन वाचनोऽपि शब्दाः चेतनस्याप्या त्मभूतं चेतनशरीरकम् परमात्मानमेवाभिदधति। यथा अचेतन