भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३३७ ) देवादिसंस्थानपिण्डवाचिनः शब्दाः तच्छरीरकजीवात्मन एव वाचकाः “चत्वारः पंचदशरात्रात् देवत्वं गच्छन्ति” इत्यादिषु, देवा भवन्ति इत्यर्थः । अधिक क्या—"यह सब ब्रह्मात्मक है" इस वाक्य से चेतन मिश्रित प्रपंच जगत को "इदंसर्वम्" द्वारा बतलाकर "वही इसका आत्मा है" ऐसा ब्रह्मात्मभाव का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार सारा चेतन अचेतन जगत ब्रह्मात्मक होने से सचेतन है और उस ब्रह्म का शरीर है । तथा अन्य श्रौत वाक्य भी—'वही जन समूह के अन्तस्थ शासक और सर्वात्मा हैं, जो कि पृथिवी में अन्तर्यामी रूप से नियमन करते हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पृथिवी उनका शरीर है, वही अमृत स्वरूप परमात्मा तुम्हारे अन्तर्यामी हैं” “जो आत्मा में विराजते हैं, आत्मा से भिन्न हैं, आत्मा उन्हें नहीं जानता, आत्मा ही उनका शरीर है, जो अन्तर्यामी रूप से आत्मा का संयमन करते हैं, वही अमृत स्वरूप, तुम्हारे अन्तर्यामी आत्मा है ।” तथा— 'जो पृथिवी में संचरण करते हैं, पृथिवी उनका शरीर है, जो जल में संचरण करते हैं, जल उनका शरीर है” “जो अक्षर (जीव) में संचरण करते हैं, अक्षर ही उनका शरीर है, अक्षर जिन्हें नहीं जानता, वह नारायण ही सब भूतों के अंतरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, द्योतमान एक और अद्वितीय है” इत्यादि—सचेतन जगत को उनका शरीर बतलाकर उस जगत के आत्म स्वरूप परमात्मा का उपदेश दिया गया है । अचेतन वाचक शब्द समूह भी, चेतन शरीर धारी तथा चेतन के भी आत्मभूत परमात्मा के ही, अभिधायक हैं । जैसे कि—"पंद्रह दिन के अनुष्ठान से चारो देवत्व प्राप्त करते हैं" अर्थात् देवता होते हैं । इत्यादि । शरीरस्य शरीरिणंप्रति प्रकारत्वात् प्रकारवाचिनां च शब्दानां प्रकारिण्येव पर्यवसानात् शरीरवाचिनांशब्दानां शरीरि- पर्यवसानं न्याय्यम् । प्रकारो हि नाम इदमित्थमिति प्रतीयमाने वस्तुनि इत्थमिति प्रतीयमानोंऽशः । तस्य तद् वस्त्वपेक्षत्वेन तत्प्रती- तेस्तदपेक्षत्वात् तस्मिन्नेव पर्यवसानं युक्तमिति तस्य प्रतिपादकोऽपि