श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२४ ) धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । तथा-“सोऽयं देवदत्तः” इत्यतीतकाल विप्र- कृष्टदेशविशेषस्य तेनैव रूपेण सन्निहितदेशवर्त्तमानकालविशिष्टतया प्रतिपादनानुपपत्ते रुभयदेशकालोपलक्षितस्वरूपमात्रैक्यं सामाना- धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । यद्यपि नीलमित्याद्येकपदश्रवणे प्रतीयमानं विशेषणं सामानाधिकरण्यवेलायां विरोधान्न प्रतिपाद्यते । तथाऽपि वाच्येऽर्थे प्रधानांशस्य प्रतिपादनान्न लक्षणा । अपितु विशेषणांशस्या विवक्षामात्रम् सर्वत्र सामानाधिकरण्यस्यैष एव स्वभाव इति न कश्चिद्दोष इति । यदि कहो कि-समानता बतलाने वाले शब्दों का तात्पर्य अभेद प्रतिपादन ही है, इसलिए यहाँ-जीव, ब्रह्म का विशिष्ट अंश है-ऐसा अर्थ नहीं हो सकता । समानता के प्रसंग में विशेषता का प्रश्न स्वतः ही निवृत्त हो जाता है तथा वस्तुगत एकत्व मात्र की प्रतीति होती है इसलिए लक्षणा द्वारा अर्थ करने की बात ही उपस्थित नहीं होती [अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा की विशेषताओं को हटाकर उनकी वास्तविक एकता को समझ लिया जावे तो-वह और तू का भेद, जो कि औपचारिक अर्थ है-समाप्त हो जायगा । लक्ष्यार्थ करने की क्या आवश्यकता है ?] जैसे कि-“नीलोत्पल” वाक्य मे दो पदों द्वारा विशेष्य और विशेषण का प्रतिपादन किया गया है, न कि नीलत्व और उत्पलत्व दो विशेषणों की योजना है। यदि इन दोनों को अलग-अलग विशेषण रूप से कहा गया होता तो नीलत्व विशिष्टाकार से, उत्पलत्व विशिष्टाकार की एकता का प्रतिपादन हो जाता । सो तो संभव हो नही सकता, क्यों उत्पलत्व, नीलत्व का विशेषण होगा नही। ऐसा होने से तो जाति और गुण का अन्योन्य समवाय संबंध हो जायगा । इसलिए समझना चाहिए कि-नीलत्व और उत्पलत्व धर्मद्वयविशिष्ट वस्तुओं की, सामानाधिकरण्य द्वारा ही, एकता बतलाई गई है । तथा “यह वही देवदत्त है” इस वाक्य में भी, अतीत काल और स्थान विशेष में देखे गए, देवदत्त को देखकर वर्त्तमान काल में जो उपलब्धि होती है, उसमें, रूप सामानाधिकरण्य ही, कारण है । इसी से एकता की प्रतीत होती है ।