श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२३ ) विलीन हो जाती है"—यह सारा ही जगत ब्रह्मात्मक है।" इत्यादि शास्त्र वाक्यों में, जगत की सदात्मकता, सृष्टि के पूर्व नाम रूप विभाग का निराकरण, तथा सृष्टि कालिक अनंत स्थावर जंगम रूपों में व्यक्त होने का ब्रह्म का अनन्य असाधारण संकल्प विशेष, संकल्पानुरूप विलक्षण क्रम विशेष, विचित्र विशिष्ट सृष्टि रचना, एवं समस्त अचेतन वस्तुओं में जीवरूप से प्रवेश कर नाम रूप व्याकृति, अपने में ही समस्त जीवों की लीनता, इत्यादि ब्रह्म की अनंत विशेषताओं का प्रतिपादन किया गया है। उन्हीं विशेषताओं से संबंधित अन्य प्रकरणों में भी, निष्पापता, निर्दोषता, सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सत्यकामता, सत्यसंकल्पना, सर्वानंद- कारिता, अत्यानंदमयता, इत्यादि अनेक प्रामाणिक सहस्रों विशेषताओं का भी प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार असाधारण अगोचर, अनंत विशेषण विशिष्ट ज्ञेय ब्रह्म के बोधक "तत्" शब्द की निर्विशेष (सामान्य) वस्तुओं से समता नितान्त असंगत प्रतीत होनी है, यह तो प्रमत्तों का सा प्रलाप है। "त्वं" पद संसारी विशिष्ट जीवात्मा का बोधक है उसकी भी यदि निर्विशेष ( सामान्य ) रूप से कल्पना की जाय तो, "त्वं" पद के वास्तविक अर्थ का गला घोटना मात्र है। वह निर्विशेष प्रकाशस्वरूप वस्तु अविद्या से आवृत हो जाती है इसलिए उसके वास्तविक स्वरूप का नाश हो जाता है; यह संभावना भी असंभव है, ऐसा पहिले ही कह चुका हूँ। यदि ऐसा मान लेंगे तो, सामानाधिकरण्य बोध्य तत् त्वं दोनों ही पदों के मुख्यार्थ का त्याग करके लक्षणा का आश्रय लेना पड़ेगा। अथोच्येत—सामानाधिकरण्यवृत्तानामेकार्थप्रतिपादनपरतया विशेषणांशे तात्पर्या संभवादेव विशेषणनिवृत्तेर्वस्तुमात्रैकत्वप्रति- पादनान्नलक्षणा प्रसंगः । यथा “नीलमुत्पलम्” इति पदद्वयस्य विशेष्यैकत्वप्रतिपादनपरत्वेन नीलत्वोत्पलत्वस्वरूपविशेषणद्वयं न विवक्ष्यते । तद्विवक्षायां हि नीलत्वविशिष्टाकारेणोत्पलत्व- विशिष्टाकारस्यैकत्वप्रतिपादनं प्रसज्यते । तत्तु न संभवति न हि नैल्यविशिष्टाकारेण तद्वस्तूतपलपदेन विशेष्यते, जातिगुणयोरन्योन्य समवायप्रसंगात् । अतो नीलत्वोत्पलक्षितवस्त्वेकत्वमात्रं सामाना-