भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३२१ ) मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातम्” इति दृष्टान्तोऽपि न घटते । मृत्पिण्ड विज्ञानेन हि तद्विकारस्य ज्ञातता निदर्शिता । तत्रापि विकारस्यासत्यताऽभिप्रेतेति चेत्, मृद्विकारस्य रज्जुसर्पादिवद- सत्यत्वं शुश्रूषोरसिद्धमिति प्रतिज्ञातार्थ संभावना प्रदर्शनाय “यथा सोम्य” इति प्रसिद्धवदुपन्यासो न युज्यते । न च तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्यज्ञानोत्पत्तेः प्राग्विकारजातस्य असत्यतामापादयत् तर्कानु- गृहीतं वा प्रमाणमुपलभामह इति । अयमर्थः “तदन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्य” इत्यत्र वक्ष्यते । जो यह कहो कि—एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा का तात्पर्य है कि “निर्विशेष वस्तु मात्र ही सत्य है ।” सो यह कथन भी ठीक न होगा ।” जिससे अश्रुत श्रुत-अमत, मत तथा अज्ञात, ज्ञात होता है” इस वाक्य का सही अर्थ यह है कि—जिससे अश्रुत पदार्थ भी परिश्रुत होता है । यदि, एकमात्र कारणताविशिष्ट को ही शास्त्र में सत्य माना गया होता तो, “सोम्य ! एक मृत्पिण्ड से सारे मृण्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है” यह दृष्टान्त संगत नहीं हो सकता । इस उदाहरण में मृत्पिण्ड से विकारता दिखलाई गई है । इस पर भी कहें कि—यहाँ भी, विकार की असत्यता ही कही गई है, तो भी मिट्टी के निर्मित घड़े आदि, रस्सी में सर्प की भ्रान्ति की तरह, असत्य तो प्रतीत होते नहीं । अनुभूत पदार्थ की सत्यता के प्रतिपादन की संभावना मात्र के लिए ही केवल, “हे सौम्य !” इत्यादि वाक्य में प्रसिद्ध नियम का व्याख्यान किया गया हो, ऐसा समझ में नहीं आता । न “तत्त्वमसि” आदि वाक्यजन्य ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व का कोई ऐसा तर्कानुमोदित प्रामाणिक वाक्य ही मिलता है, जिससे विकृत पदार्थों की असत्यता सिद्ध हो सके । इस सारे तात्पर्य को सूत्रकार—तदन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ सूत्र में बतलाते हैं । तथा—“सदेवसोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयं”तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति, तत्तेजोऽसृजत्”—“हन्त इमास्तिस्रो देवता, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—“सन्मूलाः सौम्येमाः ankurnagpal108@gmail.com