भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 385

( ३२५ ) यद्यपि केवल एक पद "नील" को सुनकर यही ज्ञात होता है कि, यह किसी वस्तु की विशेषता का बोधक है, पर जब उसकी समानता की जाती है तब विरोधी तत्त्व होने के कारण उसकी वैसी प्रतीति नही होती, किन्तु वाच्यार्थ में प्रधान अंश का प्रतिपादन ज्ञात होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं होती अपितु विशेषणांश के जानने मात्र की आवश्यकता होती है । सभी जगह सामानाधिकरण्य का ऐसा ही विधान है इसलिए कोई दोष नहीं है । तदिदमसारं—सर्वेष्वेववाक्येषु पदानां व्युत्पत्तिसिद्धार्थ संसर्ग विशेषमात्रं प्रत्याय्यम् । तत्र समानाधिकरणवृत्तानामपि नीलादि- पदानां नैल्यादिविशिष्टएवार्थो व्युत्पत्ति सिद्धः, पदान्तरार्थं संसृष्टो- ऽभिधीयते । यथा "नीलमुत्पलमानय" इत्युक्ते नीलिमादिविशिष्ट- मेवानीयते । यथा च "विन्ध्याटव्यां मदमुदितो मातंगगणः तिष्ठति" इति पदद्वयावगतविशेषणविशिष्ट एवार्थः प्रतीयते । एवं वेदांत वाक्येष्वपि समानाधिकरणनिर्देशेषु तत्तद्विशेषणविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् । न च विशेषण विवक्षायामितरविशिष्टाकारं वस्त्व- न्येन विशेष्टव्यम् । अपितु सर्वै विशेषणैः स्वरूपमेव विशेष्यम् । (वाद) ऊपर कही गई सारी युक्तियाँ असंगत हैं । प्रायः सभी वाक्यों में पद समूहों का केवल व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ का विशेष संबंध ही, प्रतीति-गम्य होता है । सामानाधिकरण्य में प्रवृत्त, "नील" पद का विशिष्ट अर्थ "नीलिमा" ही व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ है । जो कि अन्य पदार्थ से संबंधित हो सकता है जैसे कि—नीलकमल लाओ" कहने पर नीलिमा गुण विशिष्ट कमल ही लाया जाता है । तथा "इस विन्ध्याटवी में मदोन्मत्त हाथियों के झुंड रहते हैं" इस वाक्य में भी, मदोन्मत्त और हस्ति समूह इन दो पदों में विशेषण और विशिष्ट अर्थ की प्रतीति होती है । इसी प्रकार समानाधिकरण्य बोधक वेदांत वाक्यों में भी, विशेषण और विशिष्ट भाव से ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है । जहाँ कहीं भी,