श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३१ ) 'एकहायनी' पद की सामानाधिकरण्य के नियम से एकहायनीयता मात्र ही प्रतीत होती है, गुण संबंध तो प्रतीत होता नहीं। विशिष्ट द्रव्यों की एकता करना ही सामानाधिकरण्य का कार्य है। जैसा कि—कैय्यट ने वृद्ध्याह्निक पर लक्षण बतलाया कि—"विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की एक मात्र अर्थ बोधकता ही सामानाधिकरण्य है।" [अर्थात्--एक- हायनी शब्द गाय का विशेषण नहीं है अपितु उसकी उम्र का बोधकमात्र है, जब कि अरुणिम शब्द उसकी वर्ण विशेषता का परिचायक है; एक हायनी के बदले सोमक्रय करना कोई विशेषता नहीं रखता अपितु अरुणिम होने से गाय की विशिष्टतापरक बहुमूल्यता सिद्ध होती है। इसलिए एकहायनी और अरुणिमा का कोई साथ नहीं है, अतः उनका अभेद संबंध भी नही हो सकता ] अतएव हि 'रक्तः पटो भवति' इत्यादिष्वैकार्थ्यादेकवाक्य- त्वम् । पटस्यभवनक्रियासंबंधे हि वाक्यव्यापारः रागसंबंधस्तु रक्तपदेनैवाभिहितः, रागसंबंधिद्रव्यं पट इत्येतावन्मात्रं सामाना- धिकरण्यावसेयम् । एकमेकेनगुणेन द्वाभ्यां बहुभिर्वा तेन तेन पदेन समस्तेन व्यस्तेन वा विशिष्टमुपस्थाप्य सामानाधिकरण्येन सर्वं विशेषणविशिष्टोऽर्थ एक इति ज्ञापयित्वा तस्य क्रिया संबंधाभि- धानमविरुद्धम् । "देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षो दंडी कुंडली तिष्ठति," शुक्लेन वाससा यवनिकां संपादयेत् "नीलमुत्पलमानय" “नीलोत्पलमानय,” गामानय शुक्लां शोभनाक्षीम् “अग्नये पथिकृते पुरोडाशमष्टकपालं निर्वपेत्” इति। एवम्--"अरुण्यैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इति। 'कपड़ा लाल होता है' इस उदाहरण में अर्थगत ऐक्य होने से, एक वाक्यता है वस्त्र का होना क्रिया से संबंध दिखलाना ही वाक्य का प्रयोजन है। उसके रंग का संबंध तो रक्तवर्ण से ही प्रतीत होता है "राग संबंधी द्रव्य पट है" केवल इतना अर्थ ही सामानाधिकरण्य से ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्यान्य सामानाधिकरण्य के प्रसंगों में प्रयुक्त ankurnagpal108@gmail.com