भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३३३ ) द्रव्यवाचिपद समानाधिकरणस्य गुणवाचिनः क्वचिदपि केवल- गुणाभिधानादर्शनात् । उपस्थितद्रव्यवाक्यस्थं गुणपदं केवलगुणाभि- धायोत्यप्यसंगतम् । "पटः शुक्लः" इत्यादिषूपात्तद्रव्यकेऽपि गुण- विशिष्टस्यैवाभिधानात् । "पटस्य शुक्लः" इत्यत्र शौक्ल्यविशिष्ट पटाप्रतिपत्तिरसमानविभक्ति निर्देशकृता, न पुनरुपात्तद्रव्यकत्व कृता तत्रैव "पटस्य शुक्लो भागः" इत्यादिषु समानविभक्तिनिर्देशे शोक्ल्यविशिष्ट द्रव्यं प्रतीयते । यत्पुनः क्रयस्यैक हायन्यवरुद्धतयाऽ- रुणिम्नः क्रयान्वयो न संभवतीति, तदपि विरोधिगुणरहित द्रव्य- वाचिपद समानाधिकरणगुणपदस्य तदाश्रयगुणाभिधानेन क्रिया- पदान्वयाविरोधादसङ्गतम् । राद्धान्ते चोक्तन्यायेनारुणिम्नः शब्दे द्रव्यान्वये सिद्धे द्रव्यगुणयोः क्रमसाधनत्वानुपपत्त्या अर्थात् परस्परा- न्वयः सिद्ध्यतीत्यप्यसंगतम् । अतोयथोक्त एवार्थः । और जो यह कहते हैं कि-जिस वाक्य में द्रव्यवाचक पद का उल्लेख होता है, उस वाक्य का गुणवाचक शब्द, उस गुण का ही बोधक होता है, इसलिए 'अरुणया' पद से केवल गुण का ही अनुमान करेंगे ( उसको द्रव्य की विशेषता नहीं मानेंगे ) ( मेरी दृष्टि में ) ऐसा मानना संगत् न होगा, क्योंकि लौकिक व्यवहार या वैदिक भाषा में कहीं भी, द्रव्य वाचक शब्द के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त गुणवाचक पद को, केवल गुणमात्र ही माना गया हो, ऐसा उदाहरण नहीं मिलता । द्रव्यवाचक पद वाले वाक्य में आए हुये गुणवाचक पद की, एकमात्र गुणबोधकता असंगत भी है। द्रव्यवाचक पद घटित "सफेद वस्त्र" इस वाक्य में भी गुणविशिष्टार्थ का प्रतिपादन किया गया है ।" कपड़े की सफेदी" इस वाक्य में, शुक्ल गुण विशिष्ट पद की प्रतीत नहीं होती, क्योंकि—इसमें असमान विभक्ति दीखती है। द्रव्य संबंध से यहाँ गुण विशिष्टता की प्रतीति न हो रही हो, सो बात नहीं है । कपड़े का सफेद हिस्सा इस वाक्य में समान विभक्ति है, इसमें शुक्ल गुण विशिष्ट द्रव्य की प्रतीति होती है । ankurnagpal108@gmail.com