श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 395, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३५ ) यदि कहें कि-यदि ऐसा मानने पर भी, समानाधिकरण पदों के समस्त विशेषण विशिष्ट पदार्थों की एकता होने से, "त्वं" पदवाची जीवात्मा के संपूर्ण दोष परमात्मा में भी प्रसक्त हो जावेंगे ? नहीं "त्वं" पद से भी, जीवान्तर्यामी परमात्मा ही मान लें तो, दोष प्रसक्ति का प्रश्न ही नहीं उठेगा । एतदुक्तं भवति सच्छब्दाभिहितं निरस्तनिखिलदोषगन्धं सत्यसंकल्पमिश्रानवधिकातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणं समस्त कारणभूतं परंब्रह्म "बहुस्याम्" इति संकल्प्य तेजोबन्नप्रमुखं कृत्स्नं जगत् सृष्ट्वा तस्मिन् देवादि विचित्रसंस्थानसंस्थिते जगति चेतनं जीववर्गं स्वकर्मानुगुणेषु शरीरेष्वात्मतया प्रवेश्य स्वयं च स्वेच्छयैव जीवान्तरात्मतयाऽनुप्रविश्य एवम्भूतेषुश्वपर्यन्तेषुदेवाद्याकारेषु- संघातेषु नामरूपे व्याकरोत् । एवं रूपं संघातस्यैव वस्तुत्वं शब्द वाच्यत्व चाकरोदित्यर्थः । अनेनजीवेनात्मना जीवेनात्मेति निर्देशो जीवस्य ब्रह्मात्मकत्वं दर्शयति । ब्रह्मात्मकत्वं च जीवस्य जीवान्त- रात्मतया ब्रह्मणोऽनुप्रवेशादित्यवगम्यते "इदसर्वमसृजत् यदिदं किं च तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत तदनु प्रविश्य सच्चत्यच्चा- भवत् ।" इति अत्रेदं सर्वमिति निर्दिष्टं चेतनाचेतनवस्तुद्वयं सत्यच्छब्दाभ्यां विज्ञानाविज्ञानशब्दाभ्यां च विभज्य निर्दिश्य चिद् वस्तुन्यपि ब्रह्मणोऽनुप्रवेशाभिधानात् । अतएव नामरूप व्याकर- णात् सर्वे वाचकाः शब्दाः, अचिज्जीवविशिष्टपरमात्मवाचिन् इत्यवगतम् । कथन यह है कि-समस्त दोषों से रहित, अवधि और संख्या रहित, सर्वाधिक, सत्य संकल्प इत्यादि कल्याणमय गुणों से युक्त, सर्व- कारण वह ब्रह्म "सत्" शब्द से संबोधित किये गए हैं, उन्होंने 'एक से अनेक हो जाऊँ" इस संकल्प से तेज जल आदि समस्त जगत की सृष्टि करके, देवता आदि विभिन्न रूपों वाले शरीरों में, चेतन जीवों के गुण- कर्मानुसार आत्मा रूप से प्रविष्ट कराके स्वयं ही स्वेच्छा से, जीवों में