भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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१४ १. पूर्वपक्ष--त्रिवृत्कृत आकाश आदि भूत समुदाय के पृथक् पृथक् व्यवहार की संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—अधिकता के अनुसार आकाश आदि नाम की व्यवहारिकता का उपपादन। —पृ० ८८७-६६, [तृतीय अध्याय] [प्रथम पाद] १ तदन्तर प्रतिपत्त्यधिकरण [सूत्र १-७] शरीर त्याग करते समय जीव भावी देह के उपादान भूतसूक्ष्म को ले जाता है या नहीं, इस पर विचार १. पूर्वपक्ष—भूतसूक्ष्म को न ले जाने की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव के साथ भूतसूक्ष्म के गमन का प्रतिपादन प्रयाण काल में वागादि इन्द्रियो की अग्नि आदि में लीनता बतलाने वाली श्रुति के आधार पर उक्त शंका का समाधान। पंचाग्निविद्या के प्रकरण में जल होम का उल्लेख न होने से सूक्ष्मभूतों के सहगमन पर उद्भूत संशय का समाधान। जीवो- ल्लेख संबंधी संशय का समाधान। —पृ०८६६-१०६, २. कृतात्ययाधिकरण (सूत्र ८-११) कर्मयोगी जीवों के चन्द्रमण्डल से लौटते समय प्राक्तन कर्म अवशिष्ट रहते हैं या नहीं, इस पर विचार। १: पूर्वपक्ष—जो कर्म फलभोग के लिए जीव के साथ जाते हैं, उनका चन्द्रमण्डल में ही भोग समाप्त हो जाता है। २. (सिद्धान्त)—कर्म के अवशिष्ट फलभोग के लिए ही पृथिवी में पुनरागमन होता है, इस मत का प्रतिपादन। १. पूर्वपक्ष— संचित शुभाशुभ कर्मानुसार जीव के जन्म का समर्थन