श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७ ३. ब्रह्म की स्व-प्रकाशता एवं ज्ञान स्वभावता का उपपादन उक्त विषय में जलसूर्यादि प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त प्रस्तुत । ४. पूर्वपक्ष—जल सूर्यादि के साथ देहस्थ परमात्मा की विषम दृष्टान्तता का दिग्दर्शन । ५. (सिद्धान्त)—वृद्धि ह्रास आदि दृष्टान्त द्वारा उक्त आपत्ति का परिहार । ६. 'नेति नेति' श्रुति का तात्पर्य निरूपण ब्रह्म के अव्यक्त भाव का वर्णन। भक्ति स्वरूप निदिध्यासन की अवस्था में ब्रह्म की अभिव्यक्ति का विवेचन। प्रकाश आदि की तरह ब्रह्म के मूर्त्तामूर्त्तरूप का वर्णन। ब्रह्म के कल्याणमय अनन्त गुणों के सद्भाव का निरूपण । —पृ० ६३४-५१, ६. अहिकुण्डलाधिकरण (सूत्र २६-२६) अहिकुण्डल के दृष्टान्त से ब्रह्म के भेदाभेद रूप का प्रतिपादन । तेज के दृष्टान्त एवं प्रकारान्तर से भी भेदाभेद का उपपादन । जड़धर्म विधेयक श्रुति के आधार पर ब्रह्म के अंशांशी भाव का निरूपण ।—पृ० ६५१-५५, ७. पराधिकरण (सूत्र ३० ३६) १. पूर्वपक्ष-श्रुति में ब्रह्म को सेतु और परिमित कहे जाने से, उससे अतिरिक्त तत्त्व के अस्तित्व की आशंका । २. (सिद्धान्त)—सादृश्यता बोधकरूप से सेतु शब्द का प्रतिपादन । उपासना के द्वैविध्य से सेतु शब्द के प्रयोग का उपपादन । स्थान विशेष से संबद्ध होने से ब्रह्म के परिमाण निर्देश का सयुक्ति प्रतिपादन । ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वृहत् पदार्थ की सत्ता का निराकरण । ब्रह्म की सर्वव्यापकता का समर्थन । —६५५-६२, ankurnagpal108@gmail.com