श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मन्त्रस्नानं ततः कुर्यादापो हि ष्ठादिभिः क्रमात्।<br>पुण्यैश्चैव तथामन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४० ॥ | शिवका स्मरण करते हुए 'आपो हि ष्ठा'* आदि मन्त्रों तथा ऋक्, यजुः एवं सामके पवित्र मन्त्रोंसे मन्त्रस्नान करना चाहिये॥ ३९-४०॥ |
| द्विजानां तु हितायैवं कथितं स्नानमद्य ते।<br>सङ्क्षिप्य यः सकृत्कुर्यात्स याति परमं पदम्॥ ४१ ॥ | ब्राह्मणोंके हितके लिये ही मैंने इस स्नानविधिका आज आपसे संक्षेपमें वर्णन किया है। जो मनुष्य एक बार भी इस विधिसे स्नान करेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ ४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चयज्ञविधानं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पंचयज्ञविधान' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गाभिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
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| वक्ष्यामि शृणु सङ्क्षेपाल्लिङ्गार्चनविधिक्रमम्।<br>वक्तुं वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरेण यत्॥ १॥ | [हे सनत्कुमार!] सुनिये, अब मैं संक्षेपमें ही क्रमसे लिङ्गार्चन-विधिका वर्णन करूँगा; क्योंकि विस्तारके साथ इसका वर्णन तो सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है॥ १॥ |
| एवं स्नात्वा यथान्यायं पूजास्थानं प्रविश्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेद्देवं त्रियम्बकम्॥ २<br><br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरविभूषितम्॥ ३ | इस विधिसे नियमपूर्वक (त्रिविध जल, भस्म एवं मन्त्रसे) स्नानकर पूजाके स्थानपर प्रवेश करके तीन प्राणायामकर त्रिनेत्र, पंचमुख, दश भुजाओंवाले, शुद्ध स्फटिकतुल्य वर्णवाले, सभी आभूषणोंसे अलंकृत तथा विचित्र वस्त्रसे विभूषित शिवका ध्यान करना चाहिये॥ २-३॥ |
| तस्य रूपं समाश्रित्य दाहनप्लावनादिभिः।<br>शैवीं तनुं समास्थाय पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ४ | उनके इस रूपका ध्यानकर दाहन तथा प्लावन आदि भूतशुद्धिकी क्रियासे युक्त शैवी देहको हृदयमें स्थापित करके परमेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये॥ ४॥ |
| देहशुद्धिं च कृत्वैव मूलमन्त्रं न्यसेत्क्रमात्।<br>सर्वत्र प्रणवेनैव ब्रह्माणि च यथाक्रमम्॥ ५ | इस प्रकार देहशुद्धि करके क्रमशः मूलमन्त्र, प्रणवयुक्त [अघोरादि पंच] ब्रह्ममन्त्रोंसे देहके सभी अंगोंमें न्यास करे॥ ५॥ |
| सूत्रे नमः शिवायेति छन्दांसि परमे शुभे।<br>मन्त्राणि सूक्ष्मरूपेण संस्थितानि यतस्ततः॥ ६ | परम कल्याणप्रद इस 'नमः शिवाय' सूत्रमें समस्त वेद तथा मन्त्र सूक्ष्मरूपमें विद्यमान रहते हैं। |
* ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।