भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158
१५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| चिरात्तयोः प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः।<br>अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः॥ ४ | कालान्तरमें उन क्षुप तथा दधीचके मध्य किसी बातके सन्दर्भमें विवाद हो गया। क्षुपका कथन था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीचका कथन था कि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है॥ ४॥ | | अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः।<br>तस्मादिन्द्रो ह्यहं वह्निर्यमश्च निर्ऋतिस्तथा॥ ५<br><br>वरुणश्चैव वायुश्च सोमो धनद एव च।<br>ईश्वरोऽहं न सन्देहो नावमन्तव्य एव च॥ ६ | राजा आठ लोकपालोंका विग्रहस्वरूप होता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अतः तुम्हें मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये॥ ५-६॥ | | महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत।<br>तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम्॥ ७<br><br>नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश्च सर्वथा।<br>श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः॥ ८ | हे सुव्रत! वह राजा महान् देवता होता है। अतः हे च्यवनपुत्र! हे महाभाग! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ७ १/२॥<br><br>उन क्षुपका वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठ द्विज दधीचने आत्मगौरवसे प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथसे क्षुपके सिरपर तेज मुष्टिका-प्रहार किया॥ ८ १/२॥ | | दधीचश्च्यावनिश्‍चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः।<br>अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना।<br>चिच्छेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः॥ ९<br><br>ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसम्भवः।<br>लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः॥ १० | बलशाली क्षुपने भी वज्रसे उन दधीचपर प्रहार किया। पूर्वकालमें राजा क्षुप ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी छींकसे उत्पन्न हुए थे। भगवान्‌की प्रेरणासे असुरोंके पराजयरूप कार्यके निमित्त इन्द्रसे उन्होंने वज्र प्राप्त किया था॥ ९-१०॥ | | स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः।<br>तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रमजयद्वै महाबलः॥ ११ | अपनी इच्छासे ही नर होकर वे राजा बने थे। श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्रकी भाँति राजा क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीचको जीतनेमें समर्थ हो गये॥ ११ १/२॥ | | यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः।<br>पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः॥ १२ | राजा क्षुपके वज्र-प्रहारसे निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमिपर गिर पड़े। फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने भृगु-पुत्र मुनि शुक्राचार्यका स्मरण किया॥ १२ १/२॥ | | सस्मार च तदा तत्र दुःखार्तो भार्गवं मुनिम्।<br>शुक्रोऽपि सन्धयामास ताडितं कुलिशेन तम्॥ १३ | देहधारियोंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने भी वहाँ पहुँचकर दधीचमुनिके वज्र-ताड़ित शरीरको अपने योगबलसे यथावत् जोड़ दिया॥ १३ १/२॥ | | योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः।<br>सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः॥ १४<br><br>भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर्देवदेवं निरञ्जनम्॥ १५ | दधीचके शरीरको पूर्वकी भाँति ठीककर भार्गव शुक्राचार्यने कहा—हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर! ब्रह्मा आदि देवताओंसे पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिवकी सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेवके अनुग्रहसे अवध्य हो जाओ॥ १४-१५ १/२॥ | | अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु।<br>मृतसञ्जीवनं तस्माल्लब्धमेतन्मया द्विज॥ १६ | हे द्विज! उन्हीं महादेवजीसे मैंने भी मृतसंजीवनी |