भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ३५] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नास्ति मृत्युभयं शम्भोर्भक्तानामिह सर्वतः।<br>मृतसञ्जीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते॥ १७विद्या प्राप्त की है। शिवजीके भक्तोंको मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं होता है। उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्याको अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ १६-१७॥
त्रियम्बकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम्।<br>त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्॥ १८<br><br>त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।<br>त्रिदेवस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ १९तीनों लोकोंके पिता; सोम-चन्द्र-अग्नि-इन तीनों मण्डलोंके जनक; सत-रज-तम-तीनों गुणोंके महेश्वर; तीन तत्त्वों (बुद्धि-अहंकार-मन), तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन देवों (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) तथा जगत्के सभी तीन प्रकारके पदार्थोंके स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेवका यजन करना चाहिये॥ १८-१९॥
सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा।<br>इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च॥ २०सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियोंमें, त्रिगुणात्मिका प्रकृतिमें, इन्द्रियोंमें, अन्य देवताओं तथा गणोंमें उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पोंमें गन्ध विद्यमान रहती है॥ २० १/२॥
पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः।<br>पुष्टिश्च प्रकृतिर्यस्मात्पुरुषस्य द्विजोत्तम॥ २१<br><br>महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत।<br>विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने॥ २२हे द्विजश्रेष्ठ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वरकी पुष्टि प्रकृतिरूप है। हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंका पुष्टिवर्धन करता है॥ २१-२२ १/२॥
इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः।<br>तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा॥ २३कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यानके द्वारा उन अमृतरूप महादेवका यजन करना चाहिये॥ २३ १/२॥
स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे।<br>सत्येनानेन मुक्षीयान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्॥ २४<br><br>बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः।<br>मृतसञ्जीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात्॥ २५जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रभु शिव इस सत्यके द्वारा जीवको मृत्युके पाशसे छुटकारा प्रदान करते हैं। सूर्यकी किरणोंसे पककर अपने मूलबन्धसे स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक (ककड़ी)-की भाँति वह जीव शिवाराधनके द्वारा सांसारिक बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २४ १/२॥
जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम्।<br>लिङ्गस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज॥ २६मैंने भी शिवजीसे ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है। हे द्विज! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जलका पान करने तथा दिन-रात शिवलिङ्गके सांनिध्यमें बैठकर उनका ध्यान करनेसे मृत्युका भय नहीं रह जाता॥ २५-२६॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम्।<br>वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं च लब्धवान्॥ २७उन शुक्राचार्यका वह वचन सुनकर मुनि दधीचने घोर तपस्या करके शिवकी आराधना की, जिसके