श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १५८ | ·श्रीलिङ्गमहापुराण | [·पूर्वभाग |
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| एवमाराध्य देवेशं दधीचो मुनिसत्तमः।<br>प्राप्यावध्यत्वमन्यैश्च वज्रास्थित्वं प्रयत्नतः॥ २८<br><br>अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि।<br>क्षुपो दधीचं वज्रेण जघानोरसि च प्रभुः॥ २९ | परिणामस्वरूप उनकी हड्डियाँ वज्र-तुल्य हो गयीं, वे अवध्य हो गये तथा उनकी सारी दीनता दूर हो गयी॥ २७॥<br><br>इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके मुनिश्रेष्ठ दधीचने वज्रके समान हड्डियाँ हो जाने तथा दूसरोंसे मारे न जा सकनेका वरदान प्राप्तकर चेष्टापूर्वक राजा क्षुपके सिरपर अपने चरण-मूलसे प्रहार किया। इसपर राजा क्षुपने भी अपने वज्रसे उनकी छातीपर आघात किया॥ २८-२९॥ |
| नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः।<br>प्रभावात्परमेशस्य वज्रबद्धशरीरिणः॥ ३० | किंतु भगवान् शिवके अनुग्रहसे वज्र-तुल्य शरीरवाले महात्मा दधीचको वह वज्र विनष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सका॥ ३०॥ |
| दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च<br>क्षुपो दधीचस्य तदा प्रभावम्।<br>आराधयामास हरिं मुकुन्द-<br>मिन्द्रानुजं प्रेक्ष्य तदाम्बुजाक्षम्॥ ३१ | दधीचका अवध्यत्व, उनकी अदीनता तथा उनके तपोबलका प्रभाव देखकर राजा क्षुप कमलके सदृश नेत्रवाले उपेन्द्र मुकुन्द श्रीविष्णुकी आराधना करने लगे॥ ३१॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'क्षुपाभिधन्नृपपराभववर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ अध्याय
राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन
| नन्द्युवाच<br>पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>श्रीभूमिसहितः श्रीमान् शङ्खचक्रगदाधरः॥ १<br><br>किरीटी पद्महस्तश्च सर्वाभरणभूषितः।<br>पीताम्बरश्च भगवान् देवैर्दैत्यैश्च संवृतः॥ २<br><br>प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः। | नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] उन राजा क्षुपकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवताओं तथा दैत्योंसे पूजित, हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये हुए, पीत वस्त्र पहने हुए, सभी आभूषणोंसे सुशोभित एवं मुकुट धारण किये हुए लक्ष्मी तथा भूमिसहित गरुड़ध्वज श्रीमान् भगवान् पुरुषोत्तमने उन क्षुपको दिव्य दर्शन दिया॥ १-२ ½॥ |
| दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम्॥ ३<br><br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम्। | दिव्य दर्शनके अनन्तर उन गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु देवको प्रणाम करके राजा क्षुप अत्यन्त प्रिय वाणीमें उनकी स्तुति करने लगे॥ ३ ½॥ |
| त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतिस्त्वं जनार्दनः॥ ४<br><br>पुरुषस्त्वं जगन्नाथो विष्णुर्विश्वेश्वरो भवान्।<br>योऽयं ब्रह्मासि पुरुषो विश्वमूर्तिः पितामहः॥ ५ | आप आदि हैं तथा आप आदिरहित भी हैं। आप ही प्रकृति हैं, आप ही जनार्दन हैं, आप ही पुरुष हैं, आप ही जगन्नाथ, आप ही विष्णु तथा आप ही |