भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ३८ ] विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन १६१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवमाहुर्महादेवमावयोरपि कारणम्।<br>ईशं सर्वस्य जगतः प्रभुमव्ययमीश्वरम्॥ ५इस प्रकार अविनाशी ईश्वर महादेवको हम दोनोंका भी कारण तथा सम्पूर्ण जगत्का स्वामी कहा गया है॥ ५॥
सोऽपि तस्यामरेशस्य वचनाद्वारिजोद्भवः।<br>वरेण्यं वरदं रुद्रमस्तुवत्प्रणनाम च॥ ६उन देवेश विष्णुका वचन सुनकर उन पद्मयोनि ब्रह्माने भी वर प्रदान करनेवाले पूज्य महादेवको बार-बार प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ ६॥
अथाम्भसा प्लुतां भूमिं समादाय जनार्दनः।<br>पूर्ववत्स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः॥ ७इसके अनन्तर वाराहरूप धारणकर जनार्दन विष्णुने जलसे व्याप्त भूमिको लाकर पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित किया॥ ७॥
नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः।<br>कृत्वा चोर्वीं प्रयत्नेन निम्नोन्नतविवर्जिताम्॥ ८<br>धरायां सोऽचिनोत्सर्वान् भूधरान् भूधराकृतिः।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्॥ ९तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने नदियों, नदों तथा समुद्रोंको पहलेकी भाँति कर दिया। पुनः पृथ्वीको ऊँचाई एवं निचाईसे रहितकर भूधरकी आकृतिवाले उन भगवान्ने उस समतल धरापर समस्त पर्वत स्थापित किये, भूलोक आदि चार लोक पूर्वकी भाँति रचे॥ ८-९॥
स्रष्टुं च भगवान् चक्रे मतिं मतिमतां वरः।<br>मुख्यं च तैर्यग्योन्यं च दैविकं मानुषं तथा॥ १०<br>विभुश्चानुग्रहं तत्र कौमारकमदीनधीः।<br>पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा॥ ११पुनः बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ, प्रखर प्रतिभावाले तथा ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने मुख्य सर्ग, तिर्यक् सर्ग (पशुसर्ग), देवसर्ग, मनुष्यसर्ग, अनुग्रहसर्ग एवं कौमारसर्ग रचनेका विचार किया॥ १० १/२॥
सनातनं सतां श्रेष्ठं नैष्कर्म्येण गताः परम्।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १२<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद्योगविद्यया।<br>सङ्कल्पं चैव धर्मं च ह्यधर्मं भगवान् प्रभुः॥ १३<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।उन विष्णुने आरम्भमें सनन्द, सनक तथा महात्माओंमें श्रेष्ठ सनातनका सृजन किया, जो निष्काम ज्ञानयोगमें प्रवृत्त होकर ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए॥ ११ १/२॥<br>इसके बाद सबके स्वामी भगवान् विष्णुने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ, संकल्प, धर्म तथा अधर्मको योगविद्यासे रचा। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये ही बारह संतानें हैं॥ १२-१३ १/२॥
ऋभुं सनत्कुमारं च ससर्जादौ सनातनः॥ १४<br>तौ चोर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ।<br>कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ॥ १५शाश्वत विष्णुने आरम्भमें ऋभु तथा सनत्कुमारका सृजन किया। पूर्वमें उत्पन्न वे दोनों कुमार ऊर्ध्वरेता, दिव्य, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सभी प्रकारके भावोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्माजीके ही सदृश थे॥ १४-१५॥
एवं मुख्यादिकान् सृष्ट्वा पद्मयोनिः शिलाशन।<br>युगधर्मानशेषांश्च कल्पयामास विश्वसृक्॥ १६हे शिलाद! इस प्रकार मुख्य आदि सर्गोंकी सृष्टि करके विश्वकी रचना करनेवाले पद्मयोनि (विष्णु)-ने समस्त युगधर्मोंको प्रतिष्ठित किया॥ १६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वैष्णवकथनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वैष्णवकथन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३८॥