भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 834 में से

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पृष्ठ 170
१६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ततस्तं चासृजद् ब्रह्मा भ्रुवोर्मध्येन चाच्युतम्।<br>सृष्टस्तेन हरिः प्रेक्ष्य स्थितस्तस्त्याथ सन्निधौ ॥ ३५ | हँसकर ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश किया। उन महात्मा ब्रह्माने भी उन्हें ग्रस लिया॥ ३३-३४॥<br>तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अपने भ्रूमध्यसे उन विष्णुजीको पुनः उत्पन्न कर दिया और इस प्रकार उनके द्वारा सृजित होकर भगवान् विष्णु उन्हें देखकर उनके पास खड़े हो गये॥ ३५॥ | | एतस्मिन्नन्तरे रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः।<br>विकृतं रूपमास्थाय पुरा दत्तवरस्तयोः॥ ३६<br>आगच्छद्यत्र वै विष्णुर्विश्वात्मा परमेश्वरः।<br>प्रसादममुलं कर्तुं ब्रह्मणश्च हरेः प्रभुः॥ ३७ | इसी बीच पूर्वकालमें उन दोनों [ब्रह्मा, विष्णु]-को वर देनेवाले सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले विश्वात्मा प्रभु परमेश्वर शिव विकृत रूप धारण करके ब्रह्मा एवं विष्णुपर महान् अनुग्रह करनेके लिये जहाँ विष्णुजी थे, वहींपर आ गये॥ ३६-३७॥ | | ततः समेत्य तौ देवौ सर्वदेवभवोद्भवम्।<br>अपश्यतां भवं देवं कालाग्निसदृशं प्रभुम्॥ ३८ | इसके बाद उन दोनों देवोंने शिवजीके पास पहुँचकर कालाग्नितुल्य उन सभी देवताओं तथा जगत्की उत्पत्ति करनेवाले महादेवका दर्शन किया॥ ३८॥ | | तौ तं तुष्टुवतुश्चैव शर्वमुग्रं कपर्दिनम्।<br>प्रणेमतुश्च वरदं बहुमानेन दूरतः॥ ३९ | उन दोनों (ब्रह्मा, विष्णु)-ने दूरसे ही सम्मानपूर्वक उन शर्व (भक्तोंके पापोंका नाश करनेवाले), कपर्दी (जटाजूटधारी), उग्र तथा वर देनेवाले शिवजीको प्रणाम किया और पुनः वे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३९॥ | | भवोऽपि भगवान् देवमनुगृह्य पितामहम्।<br>जनार्दनं जगन्नाथस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४० | जगत्के स्वामी भगवान् शिव पितामह ब्रह्मदेव तथा जनार्दन विष्णुपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ४०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मणो वरप्रदानं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्माको वरप्रदान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

विष्णुद्वारा महेश्वरके माहात्म्यका कथन तथा नारायणद्वारा सृष्टिका वर्णन

| शैलादिरुवाच<br>गते महेश्वरे देवे तमुद्दिश्य जनार्दनः।<br>प्रणम्य भगवान् प्राह पद्मयोनिमजोद्भवः॥ १ | **नन्दीश्वर बोले—**तदनन्तर महेश्वर महादेवके चले जानेपर ब्रह्माजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णु पद्मयोनि पितामहको उद्देश्य करके प्रणामकर उनसे कहने लगे॥ १॥ | | श्रीविष्णुरुवाच<br>परमेशो जगन्नाथः शङ्करस्त्वेष सर्वगः।<br>आवयोरखिलस्येशः शरणं च महेश्वरः॥ २ | **श्रीविष्णु बोले—**सर्वत्र गमनका सामर्थ्य रखनेवाले ये परमेश्वर ईश्वर जगन्नाथ महेश्वर शिव सम्पूर्ण जगत्के तथा हमदोनोंके शरण हैं॥ २॥ | | अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः।<br>भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयम्॥ ३<br>मामाहुर्ऋषयः प्रेक्ष्य प्रधानं प्रकृतिं तथा।<br>अव्यक्तमजममित्येवं भवन्तं पुरुषस्त्विति॥ ४ | हे ब्रह्मन्! मैं महात्मा शिवके वाम अंगसे जायमान हूँ तथा स्वयं आप महादेव रुद्रके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए हैं। अतएव इस विषयमें सम्यक् विचारकर ऋषियोंने मुझे प्रधान तथा प्रकृति एवं आपको अव्यक्त, अज तथा पुरुष कहा है॥ ३-४॥ |

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