भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ३७ ]नन्दीके जन्मका वृत्तान्त···शिवद्वारा ब्रह्मा एवं विष्णुपर अनुग्रह करना१६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदा तं कल्पमाहुर्वै मेघवाहनसंज्ञया।<br>हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा तस्य देहोद्भवस्तदा॥ २०<br>जनार्दनसुतः प्राह तपसा प्राप्य शङ्करम्।<br>तव वामाङ्गजो विष्णुर्र्दक्षिणाङ्गभवो ह्यहम्॥ २१तभीसे उस कल्पको 'मेघवाहन' नामसे कहा जाता है। उन विष्णुको देखकर उन्हींके देहसे उत्पन्न जनार्दनपुत्र हिरण्यगर्भ ब्रह्माने अपनी तपस्यासे शंकरजीको प्राप्तकर उनसे कहा- ॥ २०^{१}/_२ ॥<br>विष्णु आपके वाम अंगसे उत्पन्न हैं तथा मैं आपके दायें अंगसे उत्पन्न हूँ; फिर भी उन विष्णुने मेरे साथ सम्पूर्ण जगत्की रचना की॥ २१^{१}/_२ ॥
मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः।<br>जगन्मयोऽवहद्यस्मान्मेघो भूत्वा दिवानिशम्॥ २२<br>भवन्तमवहद्विष्णुर्देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>नारायणादपि विभो भक्तोऽहं तव शङ्कर॥ २३<br>प्रसीद देहि मे सर्वं सर्वात्मत्वं तव प्रभो।<br>तदाथ लब्ध्वा भगवान् भवात्सर्वात्मतां क्षणात्॥ २४यद्यपि जगन्मय विष्णुने मेघ बनकर आप देवदेव जगद्गुरु महेश्वरका दिन-रात वहन किया है; फिर भी हे विभो! हे शंकर! मैं उन नारायणसे भी बढ़कर आपका भक्त हूँ। अतएव हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये और मुझे अपना सर्वात्मत्व प्रदान कीजिये॥ २२-२३^{१}/_२ ॥<br>तत्पश्चात् महादेवजीसे सर्वात्मत्वकी प्राप्ति करके ब्रह्माजीने शीघ्रतापूर्वक क्षीरसागर पहुँचकर वहाँ एकार्णवमें पुरुषोत्तम विष्णुको भीषण अन्धकारमें मानसनिर्मित, स्वर्णरत्न-खचित, दुर्जनोंद्वारा दुष्प्राप्य तथा सनक आदि पुण्यात्माओंद्वारा अगोचर शुभ्र एवं दिव्य भवनमें देखा॥ २४-२६॥
त्वरमाणोऽथ सङ्गम्य ददर्श पुरुषोत्तमम्।<br>एकार्णवालये शुभ्रे त्वन्धकारे सुदारुणे॥ २५<br>हेमरत्नचिते दिव्ये मनसा च विनिर्मिते।<br>दुष्प्राप्ये दुर्जनैः पुण्यैः सनकाद्यैरगोचरे॥ २६<br>जगदावासहृदयं ददर्श पुरुषं त्वजः।<br>अनन्तभोगशय्यायां शायिनं पङ्कजेक्षणम्॥ २७
शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं चतुर्भुजम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं शशिमण्डलसन्निभम्॥ २८<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं प्रसन्नास्यं जनार्दनम्।<br>रमामृदुकराम्भोजस्पर्शरक्तपदाम्बुजम् ॥ २९<br>परमात्मानमीशानं तमसा कालरूपिणम्।<br>रजसा सर्वलोकानां सर्गलीलाप्रवर्तकम्॥ ३०<br>सत्त्वेन सर्वभूतानां स्थापकं परमेश्वरम्।<br>सर्वात्मानं महात्मानं परमात्मानमीश्वरम्॥ ३१<br>क्षीरार्णवेऽमृतमये शायिनं योगनिद्रया।<br>तं दृष्ट्वा प्राह वै ब्रह्मा भगवन्तं जनार्दनम्॥ ३२ब्रह्माजीने जगत्को अपने हृदयमें धारण करनेवाले, चारों भुजाओंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, सभी आभूषणोंसे युक्त, चन्द्र-मण्डलतुल्य आभावाले, अपने वक्षःस्थलपर 'श्री' चिह्न धारण करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरूप, रजोगुणसे युक्त होनेपर सभी लोकोंकी सृजन-लीलाके प्रवर्तक, सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सभी प्राणियोंके स्थापक, कमलनयन, प्रसन्नमुख, जनार्दन, परमपुरुष, परमात्मा, ईशान, सर्वात्मा, महात्मा, देवरूप ईश्वर विष्णुको उस अमृतमय क्षीरसागरमें अनन्त शेषनागकी शय्यापर योगनिद्रामें सोये हुए देखा; उस समय उनके रक्त-कमल-सदृश चरणोंको लक्ष्मीजी अपने अरविन्द-तुल्य कोमल हाथोंसे दबा रही थीं॥ २७-३१^{१}/_२ ॥
ग्रसामि त्वां प्रसादेन यथापूर्वं भवानहम्।<br>स्मयमानस्तु भगवान् प्रतिबुध्य पितामहम्॥ ३३भगवान् जनार्दनको देखकर ब्रह्माजीने उनसे कहा कि जिस प्रकार पहले आपने मुझे ग्रस लिया था, उसी प्रकार शिवजीकी कृपासे अब मैं आपको ग्रसूँगा॥ ३२^{१}/_२ ॥
उदैक्षत महाबाहुः स्मितमीषच्चकार सः।<br>विवेश चाण्डजं तं तु ग्रस्तस्तेन महात्मना॥ ३४भगवान् विष्णुने उठकर विस्मयपूर्ण भावसे ऊपर दृष्टि करके ब्रह्माजीको देखा और उन महाबाहुने थोड़ा