श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न दास्यति सुतं तेऽत्र मृत्युहीनमयोनिजम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् किमुतान्ये महामुने॥ ७ | कोई भी नहीं है॥ ६॥<br>हे महामुने! अयोनिज तथा मृत्युसे हीन पुत्र तो तुम्हें भगवान् ब्रह्मा भी नहीं दे सकते; अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या?॥ ७॥ |
| सोऽपि देवः स्वयं ब्रह्मा मृत्युहीनो न चेश्वरः।<br>योनिजश्च महातेजाश्चाण्डजः पद्मसम्भवः॥ ८<br><br>महेश्वराङ्गजश्चैव भवान्यास्तनयः प्रभुः।<br>तस्याप्यायुः समाख्यातं परार्धद्वयसम्मितम्॥ ९<br><br>कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परत्र ये॥ १० | साक्षात् वे परमेश्वर ब्रह्मदेव भी मृत्युहीन नहीं हैं। महान् तेजस्वी ब्रह्मा भी योनिज है; क्योंकि उनकी भी उत्पत्ति अण्ड तथा कमलसे हुई है। वे प्रभु ब्रह्मा महेश्वर एवं भवानीके पुत्र हैं। उनकी भी आयु दो परार्धके बराबर कही गयी है। प्रथम परार्धमें हजारों करोड़ कल्प भी ब्रह्माके दिनके रूपमें व्यतीत हो चुके हैं और द्वितीय परार्धमें उतने ही कल्प शेष हैं॥ ८-१०॥ |
| तस्मादयोनिजे पुत्रे मृत्युहीने प्रयत्नतः।<br>परित्यजाशां विप्रेन्द्र गृहाणात्मसमं सुतम्॥ ११ | अतएव हे विप्रेन्द्र! अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्रकी आशा प्रयत्नपूर्वक छोड़ दीजिये और अपने तुल्य पुत्र ग्रहण कीजिये॥ ११॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पिता मे लोकविश्रुतः।<br>शिलाद इति पुण्यात्मा पुनः प्राह शचीपतिम्॥ १२ | नन्दीश्वर बोले—उनका वह वचन सुनकर शिलाद नामसे लोक-विख्यात मेरे पुण्यात्मा पिताने शचीपति इन्द्रसे पुनः कहा॥ १२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन्नण्डयोनित्वं पद्मयोनित्वमेव च।<br>महेश्वराङ्गयोनित्वं श्रुतं वै ब्रह्मणो मया॥ १३<br><br>पुरा महेन्द्र दायादाद् गदतश्चास्य पूर्वजात्।<br>नारदाद्वै महाबाहो कथमत्राशु नो वद॥ १४<br><br>दाक्षायणी सा दक्षोऽपि देवः पद्मोद्भवत्मजः।<br>पौत्री कनकगर्भस्य कथं तस्याः सुतो विभुः॥ १५ | शिलाद बोले—हे भगवन्! हे महेन्द्र! मैंने पूर्वकालमें इन ब्रह्माके पूर्वोत्पन्न नारद नामक पुत्रद्वारा ऐसा कहते हुए सुन रखा है कि ये ब्रह्मा अण्ड, कमल और शिवजीके अंगसे उत्पन्न हैं; तो हे महाबाहो! मुझे आप शीघ्र बताइये कि ऐसा कैसे है? दक्षप्रजापति तो पद्मयोनि ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इस प्रकार दक्षकी पुत्री हिरण्यगर्भ ब्रह्माकी पौत्री हुई; तो फिर वे प्रभु ब्रह्मा उन दाक्षायणीके पुत्र कैसे हुए?॥ १३-१५॥ |
| शक्र उवाच<br>स्थाने संशयितुं विप्र तव वक्ष्यामि कारणम्।<br>कल्पे तत्पुरुषे वृत्तं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ १६<br><br>ससर्ज सकलं ध्यात्वा ब्रह्माणं परमेश्वरः।<br>जनार्दनो जगन्नाथः कल्पे वै मेघवाहने॥ १७<br><br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु मेघो भूत्वावहद्धरम्।<br>नारायणो महादेवं बहुमानेन सादरम्॥ १८ | इन्द्र बोले—हे विप्र! इस स्थितिमें आपका संदेह करना युक्तिपूर्ण है; किंतु मैं आपको इसका कारण बता रहा हूँ। तत्पुरुष नामक कल्पमें परमेष्ठी शिवकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई और उन परमेश्वरने ध्यान करके कलायुक्त ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जनार्दन जगत्पति नारायण विष्णुभगवान् मेघवाहन कल्पमें हजार दिव्य वर्षोंतक मेघ बनकर अत्यन्त सम्मान तथा आदरके साथ महादेव शिवके वाहन बने रहे॥ १६-१८॥ |
| दृष्ट्वा भावं महादेवो हरेः स्वात्मनि शङ्करः।<br>प्रददौ तस्य सकलं स्रष्टुं वै ब्रह्मणा सह॥ १९ | महादेव शिवने अपनेमें भगवान् विष्णुकी भक्ति देखकर उन्हें ब्रह्माजीसहित सम्पूर्ण जगत् रचनेकी आज्ञा दी॥ १९॥ |