श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वेश्वरका अर्चन करो। हे शक्तिपुत्र! सुनो, त्रैलोक्यने तुम्हारे प्रति क्या अपराध किया है?॥ ७१-७३॥ | |
| ततस्तस्य वसिष्ठस्य नियोगाच्छक्तिनन्दनः।<br>राक्षसानामभावाय मतिं चक्रे महामतिः॥ ७४<br>अदृश्यन्तीं वसिष्ठं च प्रणम्यारुन्धतीं ततः।<br>कृत्वैकलिङ्गं क्षणिकं पांसुना मुनिसन्निधौ॥ ७५<br>सम्पूज्य शिवसूक्तेन त्र्यम्बकेन शुभेन च।<br>जप्त्वा त्वरितरुद्रं च शिवसङ्कल्पमेव च॥ ७६<br>नीलरुद्रं च शाक्तेयस्तथा रुद्रं च शोभनम्।<br>वामीयं पवमानं च पञ्चब्रह्म तथैव च॥ ७७<br>होतारं लिङ्गसूक्तं च अथर्वशिर एव च।<br>अष्टाङ्गमर्घ्यं रुद्राय दत्त्वाभ्यर्च्य यथाविधि॥ ७८ | उसके बाद उन वसिष्ठकी आज्ञासे महाबुद्धिमान् शक्तिपुत्रने राक्षसोंके विनाशके लिये निश्चय किया। अदृश्यन्ती, वसिष्ठ तथा अरुन्धतीको प्रणाम करनेके अनन्तर मुनिके समीप मिट्टीका एक (पार्थिवेश्वर) क्षणिक लिङ्ग बनाकर शुभ शिवसूक्त तथा त्र्यम्बकमन्त्रसे विधिवत् पूजन करके त्वरितरुद्र, शिवसंकल्पसूक्त, नीलरुद्र, उत्तम रुद्र, वामीय, पवमान, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), होतृसूक्त, लिङ्गसूक्त तथा अथर्वशीर्ष—इन मन्त्रोंका जप करके [भगवान्] रुद्रको अष्टांग अर्घ्य प्रदान करके यथाविधि अभ्यर्थनकर वे शाक्तेय (पराशर) प्रार्थना करने लगे॥ ७४-७८॥ |
| पराशर उवाच<br>भगवन् रक्षसा रुद्र भक्षितो रुधिरेण वै।<br>पिता मम महातेजा भ्रातृभिः सह शङ्कर॥ ७९<br>द्रष्टुमिच्छामि भगवन् पितरं भ्रातृभिः सह।<br>एवं विज्ञापयँल्लिङ्गं प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः॥ ८०<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति रुरोद निपपात च। | पराशर बोले—'हे भगवन्! हे रुद्र! हे शंकर! राक्षस रुधिरने भाइयोंसहित मेरे महातेजस्वी पिताका भक्षण कर लिया। हे भगवन्! मैं अपने पिताको उनके भाइयोंसहित देखना चाहता हूँ।' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए उस लिङ्गको बार-बार प्रणामकर 'हा रुद्र! रुद्र! रुद्र!'—यह कहते हुए वे रोने लगे और गिर पड़े॥ ७९-८० १/२॥ |
| तं दृष्ट्वा भगवान् रुद्रो देवीमाह च शङ्करः॥ ८१<br>पश्य बालं महाभागे बाष्पपर्याकुलेक्षणम्।<br>ममानुस्मरणे युक्तं मदाराधनतत्परम्॥ ८२ | तब उन्हें देखकर कल्याणकारी भगवान् रुद्रने देवी [पार्वती]-से कहा—हे महाभागे! अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले, मेरे स्मरणमें लगे हुए तथा मेरी आराधनामें तत्पर [इस] बालकको देखो॥ ८१-८२॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवी पराशरमनिन्दिता।<br>दुःखात्संक्लिन्नसर्वाङ्गमस्त्राकुलविलोचनम् ॥ ८३<br>लिङ्गार्चनविधौ सक्तं हर रुद्रेति वादिनम्।<br>प्राह भर्तारमीशानं शङ्करं जगतामुमा॥ ८४ | तब निष्कलंक उन महादेवी उमाने दुःखसे दुर्बल अंगोंवाले, अश्रुपूरित नेत्रोंवाले, लिङ्गार्चनके कर्ममें संलग्न तथा 'हे हर! हे रुद्र'—ऐसा उच्चारण करनेवाले पराशरको देखकर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी अपने पति शंकरसे कहा—हे परमेश्वर! आप प्रसन्न हो जाइये और इसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर प्रदान कीजिये॥ ८३-८४ १/२॥ |
| ईप्सितं यच्छ सकलं प्रसीद परमेश्वर।<br>निशम्य वचनं तस्याः शङ्करः परमेश्वरः॥ ८५<br>भार्यामार्यामुमां प्राह ततो हालाहलाशनः।<br>रक्षाम्येनं द्विजं बालं फुल्लेन्दीवरलोचनम्॥ ८६<br>ददामि दृष्टिं मद्रूपदर्शनक्षम एष वै।<br>एवमुक्त्वा गणैर्दिव्यैर्भगवान्नीललोहितः॥ ८७ | तदनन्तर उनका वचन सुनकर विषपान करनेवाले परमेश्वर शंकरने [अपनी] भार्या साध्वी उमासे कहा—मैं खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले इस ब्राह्मण बालककी रक्षा करूँगा। मैं इसे [दिव्य] दृष्टि दे रहा हूँ; [जिससे] यह मेरे रूपका दर्शन करनेमें समर्थ होगा॥ ८५-८६ १/२॥ |