श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ६४ ] | वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा | २७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शाकेय उवाच<br>अम्ब मङ्गलभूषणैर्विना<br>देहयष्टिरनघे न शोभते।<br>वक्तुमर्हसि तवाद्य कारणं<br>चन्द्रबिम्बरहितेव शर्वरी॥ ६२<br>मातर्मातः कथं त्यक्त्वा मङ्गलाभरणानि वै।<br>आसीना भर्तृहीनेव वक्तुमर्हसि शोभने॥ ६३ | शाक्तेय (शक्तिपुत्र पराशर) बोले— हे अम्ब! हे अनघे! जैसे चन्द्रमण्डलसे रहित रात्रि सुशोभित नहीं होती है, वैसे ही आपका यह शरीर मंगल आभूषणोंके बिना सुशोभित नहीं हो रहा है; कृपा करके आज इसका कारण बताइये। हे मात:! हे मात:! मंगल आभरणोंका त्याग करके पतिविहीनाकी भाँति आप क्यों बैठी हुई हैं? हे शोभने! कृपा करके बताइये॥ ६२-६३॥ |
| अदृश्यन्ती तदा वाक्यं श्रुत्वा तस्य सुतस्य सा।<br>न किञ्चिदब्रवीत्पुत्रं शुभं वा यदि वेतरत्॥ ६४ | तब उस पुत्रकी बात सुनकर उस अदृश्यन्तीने पुत्रसे अच्छा अथवा बुरा कुछ भी नहीं कहा॥ ६४॥ |
| अदृश्यन्तीं पुनः प्राह शाक्तेयो भगवान् मम।<br>मातः कुत्र महातेजाः पिता वद वदेति ताम्॥ ६५ | भगवान् शाक्तेय (पराशर)-ने उस अदृश्यन्तीसे पुनः कहा—‘हे मात:! मेरे महातेजस्वी पिता कहाँ हैं; इसे बताइये, बताइये'॥ ६५॥ |
| श्रुत्वा रुरोद सा वाक्यं पुत्रस्यातीव विह्वला।<br>भक्षितो रक्षसा तातस्तवेति निपपात च॥ ६६ | तब पुत्रका वचन सुनकर अत्यधिक व्याकुल होकर वह रोने लगी। 'हे तात! राक्षसने तुम्हारे पिताका भक्षण कर लिया'—ऐसा कहकर वह [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ६६॥ |
| श्रुत्वा वसिष्ठोऽपि पपात भूमौ<br>पौत्रस्य वाक्यं स रुदन् दयालुः।<br>अरुन्धती चाश्रमवासिनस्तदा<br>मुनेर्वसिष्ठस्य मुनीश्वराश्च॥ ६७ | तब पौत्रकी बात सुनकर दयालु वसिष्ठ भी रोते हुए भूमिपर गिर पड़े। मुनि वसिष्ठके आश्रममें रहनेवाले श्रेष्ठ मुनिगण तथा अरुन्धती—ये सब भी गिर पड़े॥ ६७॥ |
| भक्षितो रक्षसा मातुः पिता तव मुखादिति।<br>श्रुत्वा पराशरो धीमान् प्राह चास्त्राविलेक्षणः॥ ६८ | 'तुम्हारे पिताको राक्षस खा गया'—माताके मुखसे ऐसा सुनकर अश्रुपूर्ण नेत्रवाले बुद्धिमान् पराशर कहने लगे॥ ६८॥ |
| पराशर उवाच<br>अभ्यर्च्य देवदेवेशं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>क्षणेन मातः पितरं दर्शयामीति मे मतिः॥ ६९ | पराशर बोले— हे मात:! देवदेवेश्वर [शिव]-की पूजा करके तथा चराचरसहित तीनों लोकोंको दग्ध करके मैं क्षणभरमें पिताका दर्शन कराता हूँ—ऐसा मेरा विचार है॥ ६९॥ |
| सा निशम्य वचनं तदा शुभं<br>सस्मिता तनयमाह विस्मिता।<br>तथ्यमेतदिति तं निरीक्ष्य सा<br>पुत्र पुत्र भवमर्चयेति च॥ ७० | तब इस शुभ वचनको सुनकर वह आश्चर्यचकित हो गयी; उसकी ओर देखकर मुसकराकर उसने पुत्रसे कहा—हे पुत्र! हे पुत्र! यह सत्य है; तुम शिवकी पूजा करो॥ ७०॥ |
| ज्ञात्वा शक्तिसुतस्यास्य सङ्कल्पं मुनिपुङ्गवः।<br>वसिष्ठो भगवान् प्राह पौत्रं धीमान् घृणानिधिः॥ ७१ | तदनन्तर इस शक्तिपुत्र [पराशर]-के संकल्पको जानकर दयानिधि, बुद्धिमान् तथा मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने पौत्रसे कहा— |
| स्थाने पौत्र मुनिश्रेष्ठ सङ्कल्पस्तव सुव्रत।<br>तथापि शृणु लोकस्य क्षयं कर्तुं न चार्हसि॥ ७२<br>राक्षसानामभावाय कुरु सर्वेश्वरार्चनम्।<br>त्रैलोक्यं शृणु शाक्तेय अपराध्यति किं तव॥ ७३ | हे पौत्र! हे मुनिश्रेष्ठ! हे सुव्रत! सुनो; तुम्हारा संकल्प उचित है, फिर भी तुम [सम्पूर्ण] लोकका विनाश मत करो। तुम राक्षसोंके नाशके लिये |