भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
२७०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जगूस्तदा च पितरो ननृतुश्च पितामहाः।<br>प्रपितामहाश्च विप्रेन्द्रा ह्यावतीर्णे पराशरे॥ ५०<br>ये ब्रह्मवादिनो भूमौ ननृतुर्दिवि देवताः।<br>पुष्कराद्याश्च ससृजुः पुष्पवर्षं च खेचराः॥ ५१<br>पुरेषु राक्षसानां च प्रणादं विषमं द्विजाः।<br>आश्रमस्थाश्च मुनयः समूहुर्हर्षसन्ततिम्॥ ५२हे विप्रेन्द्रो! पराशरके अवतार लेनेपर उस समय सभी पितामह-प्रपितामह आदि पितृगण नाचने तथा गाने लगे। जो ब्रह्मवादी लोग थे, वे पृथ्वीपर एवं देवता लोग स्वर्गमें नृत्य करने लगे। पुष्कर आदि मेघोंने जलकी तथा अन्य आकाशचारियोंने पुष्पोंकी वर्षा की। [उस समय] राक्षसोंके नगरोंमें गृध्रादि अमंगल ध्वनि करने लगे और आश्रममें स्थित मुनियोंने अपार हर्ष मनाया॥ ५०-५२॥
अवतीर्णो यथा ह्यण्डाद्द्विजानुः सोऽपि पराशरः।<br>अदृश्यन्त्याश्चतुर्वक्त्रो मेघजालाद्दिवाकरः॥ ५३<br>सुखं च दुःखमभवददृश्यन्त्यास्तथा द्विजाः।<br>दृष्ट्वा पुत्रं पतिं स्मृत्वा अरुन्धत्या मुनेस्तथा॥ ५४<br>दृष्ट्वा च तनयं बाला पराशरमतिद्युतिम्।<br>ललाप विह्वला बाला सन्नकण्ठी पपात च॥ ५५जैसे अण्डसे चतुरानन (ब्रह्मा) और मेघसमूहोंसे सूर्य प्रकट होते हैं, उसी प्रकार वे पराशर भी अदृश्यन्तीसे अवतरित हुए। हे द्विजो! पुत्रको देखकर तथा पतिका स्मरण करके अदृश्यन्तीको सुख तथा दुःख दोनों ही हुआ और अरुन्धती तथा मुनि [वसिष्ठ]-को भी सुख-दुःख हुआ। अत्यधिक कान्तिवाले पुत्र पराशरको देखकर विह्वल तथा रुँधे कण्ठवाली वह बाला विलाप करने लगी और [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ५३-५५॥
सा पराशरमहो महामतिं<br>देवदानवगणैश्च पूजितम्।<br>जातमात्रमनघं शुचिस्मिता<br>बुध्य साश्रुनयना ललाप च॥ ५६<br>हा वसिष्ठसुत कुत्रचिद् गतः<br>पश्य पुत्रमनघं तवात्मजम्।<br>त्यज्य दीनवदनां वनान्तरे<br>पुत्रदर्शनपरामिमां प्रभो॥ ५७<br>शक्ते स्वं च सुतं पश्य भ्रातृभिः सह षण्मुखम्।<br>यथा महेश्वरोऽपश्यत्सगणो हृष्टिताननः॥ ५८पवित्र मुसकानवाली वह [अदृश्यन्ती] उत्पन्न हुए उस पराशरको महाबुद्धिमान्, देवताओं तथा दानवोंसे पूजित और निष्पाप जानकर आँखोंमें आँसू भरकर विलाप करने लगी—'हे वसिष्ठसुत [शक्ति]! हे प्रभो! पुत्र-दर्शनकी इच्छावाली इस दीनवदनाको तथा अपने पुत्रको वनके बीचमें छोड़कर आप कहाँ चले गये? अपने निष्पाप पुत्रका दर्शन कीजिये। हे शक्ते! आप भाइयोंके साथ अपने पुत्रको देखिये, जैसे महेश्वरने प्रसन्नमुख होकर [अपने] गणोंके साथ षण्मुख (कार्तिकेय)-को देखा था'॥ ५६-५८॥
अथ तस्यास्तदालापं वसिष्ठो मुनिसत्तमः।<br>श्रुत्वा स्नुषामुवाचेदं मा रोदीरिति दुःखितः॥ ५९तत्पश्चात् उसके विलापको सुनकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने दुःखित होकर [अपनी] पुत्रवधूसे यह वचन कहा—'मत रोओ'॥ ५९॥
आज्ञया तस्य सा शोकं वसिष्ठस्य कुलाङ्गना।<br>त्यक्त्वा ह्यापालयद् बालं बाला बालमृगेक्षणा॥ ६०तब बालमृगके समान नेत्रोंवाली वह कुलीन बाला वसिष्ठकी आज्ञासे शोक त्याग करके [उस] बालकका पालन करने लगी॥ ६०॥
दृष्ट्वा तामबलां प्राह मङ्गलाभरणैर्विना।<br>आसीनामाकुलां साध्वीं बाष्पपर्याकुलेक्षणाम्॥ ६१तदनन्तर आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाली तथा व्याकुल उस साध्वी अबलाको आभूषणोंसे रहित होकर बैठी देखकर पराशर यह कहने लगे॥ ६१॥