श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथापि भर्तृरहिता दीना नारी भवेदिह।<br>पाहि मां तत आर्येन्द्र परिभूता भविष्यति॥ ३८<br><br>पिता माता च पुत्राश्च पौत्राः श्वशुर एव च।<br>एते न बान्धवाः स्त्रीणां भर्ता बन्धुः परा गतिः॥ ३९ | ब्रह्मपुत्र! हे जगद्गुरो! इस दुःखसे मेरी रक्षा कीजिये। पतिरहित स्त्री इस लोकमें दीन तथा असहाय होती है, अतः हे आर्येन्द्र! मेरी रक्षा कीजिये। पिता, माता, पुत्र, पौत्र, श्वशुर—ये स्त्रियोंके बन्धु नहीं होते हैं; अर्थात् ये सब उसका सदाके लिये सम्पूर्ण हितसम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होते, केवल पति ही उनका बन्धु तथा परम गति होता है॥ ३५-३९॥ |
| आत्मनो यद्धि कथितमप्यर्धमिति पण्डितैः।<br>तदप्यत्र मृषा ह्यासीद् गतः शक्तिरहं स्थिता॥ ४०<br><br>अहो ममात्र काठिन्यं मनसो मुनिपुङ्गव।<br>पतिं प्राणसमं त्यक्त्वा स्थिता यत्र क्षणं यतः॥ ४१<br><br>वसिष्ठाश्वत्थमाश्रित्य ह्यमृता तु यथा लता।<br>निर्मूलाप्यमृता भर्त्रा त्यक्ता दीना स्थिताप्यहम्॥ ४२ | विद्वानोंने जो कहा है कि पत्नी पतिका आधा अंग होती है, वह भी इसमें मिथ्या हो गया; [मेरे पति] शक्ति तो चले गये, किन्तु मैं [जीवित] रह गयी। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनकी यह कठोरता है, जो प्राणतुल्य [अपने] पतिको छोड़कर मैं क्षणभरके लिये भी जीवित हूँ। हे वसिष्ठ! जैसे पीपलके वृक्षपर चढ़ी हुई लता जड़को काट देनेपर भी जीवित रहती है, वैसे ही अपने पतिसे परित्यक्त हुई मैं भी दीन होकर जीवित हूँ॥ ४०-४२॥ |
| स्नुषावाक्यं निशम्यैव वसिष्ठो भार्यया सह।<br>तदा चक्रे मतिं धीमान् यातुं स्वाश्रममाश्रमी॥ ४३<br><br>कृच्छ्रात्सभार्यो भगवान् वसिष्ठः स्वाश्रमं क्षणात्।<br>अदृश्यन्त्या च पुण्यात्मा संविवेश स चिन्तयन्॥ ४४ | तब पुत्रवधूका वचन सुनकर गृहस्थाश्रमवाले बुद्धिमान् वसिष्ठने [अपनी] भार्याके साथ अपने आश्रमको जानेका विचार किया। चिन्ता करते हुए उन भगवान् वसिष्ठने बड़े कष्टसे अपनी भार्या तथा [पुत्रवधू] अदृश्यन्तीके साथ क्षणभरमें अपने आश्रममें प्रवेश किया॥ ४३-४४॥ |
| सा गर्भं पालयामास कथञ्चिन्मुनिपुङ्गवाः।<br>कुलसन्धारणार्थाय शक्तिपत्नी पतिव्रता॥ ४५<br><br>ततः सासूत तनयं दशमे मासि सुप्रभम्।<br>शक्तिपत्नी यथा शक्तिं शक्तिमन्तमरुन्धती॥ ४६<br><br>असूत सादितिर्विष्णुं यथा स्वाहा गुहं सुतम्।<br>अग्निं यथारणिः पत्नी शक्तेः साक्षात्पराशरम्॥ ४७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! उस पतिव्रता शक्तिभार्याने [अपनी] वंशपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये किसी प्रकार [अपने] गर्भकी रक्षा की। तदनन्तर दसवें महीनेमें उस शक्तिपत्नीने अत्यन्त तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया, जैसे अरुन्धतीने शक्तिशाली शक्तिको जन्म दिया था। उस शक्तिपत्नीने साक्षात् पराशरको उसी तरह जन्म दिया, जैसे अदितिने विष्णुको, स्वाहाने गुहको और अरणिने अग्निको पुत्ररूपमें जन्म दिया था॥ ४५-४७॥ |
| यदा तदा शक्तिसूनुरवतीर्णो महीतले।<br>शक्तिस्त्यक्त्वा तदा दुःखं पितॄणां समतां ययौ॥ ४८<br><br>भ्रातृभिः सह पुण्यात्मा आदित्यैरिव भास्करः।<br>रराज पितृलोकस्थो वासिष्ठो मुनिपुङ्गवाः॥ ४९ | जब शक्तिके पुत्रने पृथ्वीतलपर अवतार लिया, तब शक्तिने दुःख त्यागकर पितरोंकी समताको प्राप्त किया। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे पुण्यात्मा वसिष्ठपुत्र [शक्ति] पितृलोकमें स्थित होकर [अपने] भाइयोंके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सूर्य आदित्योंके साथ सुशोभित होते हैं॥ ४८-४९॥ |