भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| स्वपुत्रं च स्मरन् दुःखात्पुनरेहोहि पुत्रक।<br>तव पुत्रमिमं दृष्ट्वा भो शक्ते कुलधारणम्॥ २६<br>तवान्तिकं गमिष्यामि तव मात्रा न संशयः। | पड़े। हे द्विजो! उस समय वे रोती हुई अरुन्धतीकी ओर देखकर विलाप करने लगे और अपने पुत्रका स्मरण करते हुए दुःखपूर्वक बोले—‘हे पुत्र! पुनः आ जाओ, आ जाओ। हे शक्ते! कुलको धारण करनेवाले तुम्हारे इस पुत्रको देखकर मैं तुम्हारी माताके साथ तुम्हारे पास आऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’॥ २४—२६ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा रुदन् विप्र आलिङ्ग्यारुन्धतीं तदा॥ २७<br>पपात ताडयन्तीव स्वस्य कुक्षी करेण वै।<br>अदृश्यन्ती जघानाथ शक्तिजस्यालयं शुभा॥ २८<br>स्वोदरं दुःखिता भूमौ ललाप च पपात च।<br>अरुन्धती तदा भीता वसिष्ठश्च महामतिः॥ २९<br>समुत्थाप्य स्नुषां बालामूचतुर्भयविह्वलौ॥ ३० | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर रोते हुए वे विप्र [वसिष्ठ] अरुन्धतीका आलिङ्गन करके गिर पड़े। शुभ अदृश्यन्ती भी [गर्भस्थ] शक्तिपुत्रके आश्रयरूप अपने उदरको पीटने लगी और दुःखित होकर विलाप करने लगी तथा [पृथ्वीपर] गिर पड़ी। तब डरी हुई अरुन्धती एवं महामति वसिष्ठ बाला पुत्रवधूको उठाकर भयसे विह्वल होकर [उससे] कहने लगे॥ २७–३०॥ | | विचारमुग्धे तव गर्भमण्डलं<br>कराम्बुजाभ्यां विनिहत्य दुर्लभम्।<br>कुलं वसिष्ठस्य समस्तमप्यहो<br>निहन्तुमार्ये कथमुद्यता वद॥ ३१<br>तवात्मजं शक्तिसुतं च दृष्ट्वा<br>चास्वाद्य वक्रामृतमार्यसूनोः।<br>त्रातुं यतो देहमिमं मुनीन्द्रः<br>सुनिश्चितः पाहि ततः शरीरम्॥ ३२ | हे विचारमुग्धे! हे आर्ये! कमलके समान हाथोंसे अपने दुर्लभ गर्भमण्डलको पीटकर तुम वसिष्ठके समस्त वंशको नष्ट करनेके लिये क्यों उद्यत हो? इसे बताओ। तुम्हारे पुत्र तथा शक्तिपुत्रको देखकर और उस आर्यपुत्रके मुखामृतका आस्वादन करके मुझ मुनीन्द्रने इस अपने शरीरको बचानेका निश्चय किया है, अतः तुम [अपने] शरीरकी रक्षा करो॥ ३१–३२॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्नुषामुपालभ्य मुनिं चारुन्धती स्थिता।<br>अरुन्धती वसिष्ठस्य प्राह चार्तेति विह्वला॥ ३३<br>त्वय्येव जीवितं चास्य मुनेर्यत्सुव्रते मम।<br>जीवितं रक्ष देहस्य धात्री च कुरु यद्धितम्॥ ३४ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार पुत्रवधू तथा मुनि वसिष्ठसे कहकर अरुन्धती स्थित हो गयी। पुनः दुःखी एवं व्याकुल अरुन्धतीने कहा—हे सुव्रते! अब इन मुनि वसिष्ठका तथा मेरा जीवन तुम्हारे ऊपर निर्भर है, अतः तुम धात्रीकी भाँति अपने देहकी रक्षा करो और जो हितकर हो, उसे करो॥ ३३–३४॥ | | अदृश्यन्ती उवाच<br>मया यदि मुनिश्रेष्ठो त्रातुं वै निश्चितं स्वकम्।<br>ममाशुभं शुभं देहं कथञ्चित् पालयाम्यहम्॥ ३५<br>प्रियदुःखमहं प्राप्ता ह्यसती नात्र संशयः।<br>मुने दुःखदहं दग्धा यतः पुत्री मुने तव॥ ३६<br>अहोऽद्भुतं मया दृष्टं दुःखपात्री ह्यहं विभो।<br>दुःखत्राता भव ब्रह्मन् ब्रह्मसूनो जगद्गुरो॥ ३७ | **अदृश्यन्ती बोली—**यदि मुनिश्रेष्ठने अपने जीवनकी रक्षा करनेका निश्चय किया है, तो मैं भी किसी रूपमें अपने शुभ या अशुभ देहकी रक्षा करूँगी। मुझ असतीको [अपने] पतिके वियोगका दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें सन्देह नहीं है। हे मुने! मैं दुःखसे दग्ध हूँ। हे मुने! मैं आपकी पुत्री हूँ; मैंने अद्भुत बात देखी है। हे विभो! मैं दुःखकी पात्र हूँ। अतः हे ब्रह्मन्! हे |