श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६४ ] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा [ २६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नहीं करना चाहिये; क्योंकि सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला शक्तिपुत्र मेरे गर्भमें स्थित है'॥ १०-१२॥ | |
| एवमुक्त्वाथ धर्मज्ञा कराभ्यां कमलेक्षणा।<br>उत्थाप्य श्वशुरं नत्वा नेत्रे सम्मृज्य वारिणा॥ १३<br>दुःखितापि परित्रातुं श्वशुरं दुःखितं तदा।<br>अरुन्धतीं च कल्याणीं प्रार्थयामास दुःखिताम्॥ १४ | ऐसा कहकर कमलके समान नेत्रोंवाली उस धर्मज्ञाने अपने हाथोंसे श्वशुरको उठाकर [उन्हें] प्रणाम करके जलसे [उनके] नेत्रोंको धोकर स्वयं दुःखित होनेपर भी दुःखी श्वशुरकी रक्षा करनेके लिये दुःखसे युक्त कल्याणी अरुन्धतीसे प्रार्थना की॥ १३-१४॥ |
| स्नुषावाक्यं ततः श्रुत्वा वसिष्ठोत्थाय भूतलात्।<br>संज्ञामवाप्य चालिङ्ग्य सा पपात सुदुःखिता॥ १५<br>अरुन्धती कराभ्यां तां संस्पृश्यास्त्राकुलेक्षणाम्।<br>रुरोद मुनिशार्दूलो भार्यया सुतवत्सलः॥ १६ | तदनन्तर पुत्रवधूका वचन सुनकर चैतन्य प्राप्तकर पुत्रवत्सल मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भूमिसे उठकर अरुन्धतीका आश्रय ले अश्रुपूरित नेत्रोंवाली उस अदृश्यन्तीका हाथोंसे स्पर्श करके भार्यासहित रो पड़े। वह अदृश्यन्ती भी अत्यन्त दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़ी॥ १५-१६॥ |
| अथ नाभ्यम्बुजे विष्णोर्यथा तस्याश्चतुर्मुखः।<br>आसीनो गर्भशय्यायां कुमार ऋचमाह सः॥ १७ | तदनन्तर विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माकी भाँति उसकी गर्भशय्यामें आसीन उस शिशुने एक ऋचाका उच्चारण किया॥ १७॥ |
| ततो निशम्य भगवान् वसिष्ठ ऋचमादरात्।<br>केनोक्तमिति सञ्चिन्त्य तदातिष्ठत्समाहितः॥ १८ | तब उस ऋचाको आदरपूर्वक सुनकर 'किसने इसका उच्चारण किया'—ऐसा सोचकर भगवान् वसिष्ठ एकाग्रचित्त होकर बैठ गये॥ १८॥ |
| व्योमाङ्गणस्थोऽथ हरिः पुण्डरीकनिभेक्षणः।<br>वसिष्ठमाह विश्वात्मा घृणया स घृणानिधिः॥ १९<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र वसिष्ठ सुतवत्सल।<br>तव पौत्रमुखाम्भोजादुद्गेषाद्य विनिःसृता॥ २०<br>मत्समस्तव पौत्रोऽसौ शक्तिजः शक्तिमान् मुने।<br>तस्मादुत्तिष्ठ सन्त्यज्य शोकं ब्रह्मसुतोत्तम॥ २१<br>रुद्रभक्तश्च गर्भस्थो रुद्रपूजापरायणः।<br>रुद्रदेवप्रभावेण कुलं ते सन्तरिष्यति॥ २२<br>एवमुक्त्वा घृणी विप्रं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं तत्रैवान्तरधीयत॥ २३ | उसके बाद कमलके समान नेत्रवाले, विश्वात्मा तथा कृपानिधि विष्णुने आकाशमें स्थित होकर कृपापूर्वक वसिष्ठसे कहा—'हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे वसिष्ठ! हे पुत्रवत्सल! आपके पौत्रके मुखकमलसे यह ऋचा निकली है। हे मुने! शक्तिका यह पुत्र तथा आपका पौत्र मेरे समान शक्तिशाली होगा, अतः हे ब्रह्मपुत्रोंमें श्रेष्ठ! शोकका त्याग करके उठिये। यह गर्भस्थ शिशु रुद्रका भक्त होगा और रुद्रकी पूजामें संलग्न रहेगा; यह रुद्रदेवकी कृपासे आपके कुलका उद्धार करेगा'। मुनिश्रेष्ठ विप्र वसिष्ठसे ऐसा कहकर दयालु भगवान् विष्णु वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १९-२३॥ |
| ततः प्रणम्य शिरसा वसिष्ठो वारिजेक्षणम्।<br>अदृश्यन्त्या महातेजाः पस्पर्शोदरमादरात्॥ २४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च सुदुःखितः।<br>ललापारुन्धतीं प्रेक्ष्य तदासौ रुदतीं द्विजाः॥ २५ | तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले विष्णुको सिर झुकाकर प्रणाम करके महातेजस्वी वसिष्ठने आदरपूर्वक अदृश्यन्तीके उदरका स्पर्श किया; और हा पुत्र! पुत्र! पुत्र!—ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखित होकर वे गिर |