श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| २६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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चौंसठवाँ अध्याय
वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं हि राक्षसा शक्तिर्भक्षितः सोऽनुजैः सह।<br>वासिष्ठो वदतां श्रेष्ठ सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! राक्षस [रुधिर]-ने अनुजोंसहित वसिष्ठपुत्र शक्तिका भक्षण कैसे कर लिया; इसे आप कृपा करके बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>राक्षसो रुधिरो नाम वसिष्ठस्य सुतं पुरा।<br>शक्तिं स भक्षयामास शक्तेः शापात् सहानुजैः॥ २<br>वसिष्ठयाज्यं विप्रेन्द्रास्तदादिश्यैव भूपतिम्।<br>कल्माषपादं रुधिरो विश्वामित्रेण चोदितः॥ ३ | **सूतजी बोले—**रुधिर नामक राक्षस पूर्वकालमें [विश्वामित्रद्वारा दिये गये] शापके कारण वसिष्ठके पुत्र शक्तिको उनके छोटे भाइयोंसहित खा गया था। हे विप्रो! उस रुधिरने विश्वामित्रसे प्रेरित होकर वसिष्ठके यजमान राजा कल्माषपादके शरीरमें प्रवेश करके उसका भक्षण किया था॥ २-३॥ |
| भक्षितः स इति श्रुत्वा वसिष्ठस्तेन रक्षसा।<br>शक्तिः शक्तिमतां श्रेष्ठो भ्रातृभिः सह धर्मवित्॥ ४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः।<br>अरुन्धत्या सह मुनिः पपात भुवि दुःखितः॥ ५<br>नष्टं कुलमिति श्रुत्वा मर्तुं चक्रे मतिं तदा।<br>स्मरन् पुत्रशतं चैव शक्तिज्येष्ठं च शक्तिमान्॥ ६<br>न तं विनाहं जीविष्ये इति निश्चित्य दुःखितः॥ ७ | राक्षसने भाइयोंसहित शक्तिशालीयोंमें श्रेष्ठ शक्तिका भक्षण कर लिया—ऐसा सुनकर वसिष्ठजी अरुन्धतीके साथ दुःखित होकर 'हा पुत्र! पुत्र!'-बार-बार कहकर विलाप करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े। [मेरा] कुल नष्ट हो गया—यह सुनकर अपने सौ पुत्रों तथा ज्येष्ठ पुत्र शक्तिका स्मरण करते हुए उन शक्तिमान् वसिष्ठने 'अब मैं उसके बिना जीवित नहीं रहूँगा'—ऐसा निश्चय करके दुःखित होकर मरनेका विचार किया॥ ४-७॥ |
| आरुह्य मूर्धानमजात्मजोऽसौ<br>तयात्मवान् सर्वविदात्मविच्च।<br>धराधरस्यैव तदा धरायां<br>पपात पत्या सहसाश्रुदृष्टिः॥ ८ | नेत्रोंमें आँसू भरे हुए वे आत्मवान्, सर्वज्ञ तथा आत्मवेत्ता ब्रह्मापुत्र वसिष्ठजी पत्नी [अरुन्धती]-के साथ पर्वतके शिखरपर चढ़कर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८॥ |
| धराधरात्तं पतितं धरा तदा<br>दधार तत्रापि विचित्रकण्ठी।<br>कराम्बुजाभ्यां करिखेलगामिनी<br>रुदन्तमादाय रुरोद सा च॥ ९ | तब विचित्र हार पहने हुए तथा हाथीके समान क्रीड़ायुक्त चालवाली पृथ्वीने पर्वतसे गिरे हुए उन वसिष्ठको धारण कर लिया और वह कमलके समान [अपने] हाथोंसे उन रोते हुए वसिष्ठको पकड़कर [स्वयं] रुदन करने लगी॥ ९॥ |
| तदा तस्य स्नुषा प्राह पत्नी शक्तेर्महामुनिम्।<br>वसिष्ठं वदतां श्रेष्ठं रुदन्ती भयविह्वला॥ १० | तदनन्तर उनकी पुत्रवधू तथा शक्तिकी पत्नी भयसे व्याकुल होकर रोती हुई वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुनि वसिष्ठसे कहने लगी— |
| भगवन् ब्राह्मणश्रेष्ठ तव देहमिदं शुभम्।<br>पालयस्व विभो द्रष्टुं तव पौत्रं ममात्मजम्॥ ११<br>न त्याज्यं तव विप्रेन्द्र देहमेतत्सुशोभनम्।<br>गर्भस्थो मम सर्वार्थसाधकः शक्तिजो यतः॥ १२ | 'हे भगवन्! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हे विभो! अपने पौत्र तथा मेरे पुत्रकी देखभाल करनेके लिये आप अपने इस पवित्र देहकी रक्षा कीजिये। हे विप्रेन्द्र! आपको अपने इस परम सुन्दर शरीरका त्याग |