भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन [ २६५


अन्नोदकं मूलफलं ओषधीश्च प्रवर्तयन् ।<br>तानेताञ्जीवयामास कारुण्यादौषधेन च ॥ ८२<br>अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु सुतानुत्पादयाच्छतम् ।<br>ज्यायसोऽजनयच्छक्तेरदृश्यन्ती पराशरम् ॥ ८३वसिष्ठने अरून्धतीसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शक्तिसे अदृश्यन्तीने पराशरको जन्म दिया था॥ ७९-८३॥
रक्षसा भक्षिते शक्तौ रुधिरेण तु वै तदा ।<br>काली पराशराज्जज्ञे कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ॥ ८४<br>द्वैपायनो ह्यरण्यां वै शुकमुत्पादयत्सुतम् ।<br>उपमन्युं च पीवर्यां विद्धीमे शुकसूनवः ॥ ८५<br>भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरस्तु पञ्चमः ।<br>कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता ॥ ८६<br>जननी ब्रह्मदत्तस्य पत्नी सा त्वनुहस्य च ।<br>श्वेतः कृष्णश्च गौरश्च श्यामो धूम्रस्तथारुणः ॥ ८७<br>नीलो बादरिकश्चैव सर्वे चैते पराशराः ।<br>पराशराणामष्टौ ते पक्षाः प्रोक्ता महात्मनाम् ॥ ८८राक्षस रुधिरके द्वारा शक्तिका भक्षण कर लिये जानेपर कालीने पराशरसे प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-को जन्म दिया। तदनन्तर कृष्णद्वैपायनने अरणीसे शुक और उपमन्युको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और पीवरीसे उत्पन्न शुकदेवके इन पुत्रोंको जानिये— भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवाँ गौर। उनकी कीर्तिमती [नामक] कन्या भी हुई, जो योगमाता तथा व्रत धारण करनेवाली थी। वह ब्रह्मदत्तकी माता एवं अनुहकी पत्नी थी। श्वेत, कृष्ण, गौर, श्याम, धूम्र, अरुण, नील तथा बादरिक—ये सब पराशरके वंशज थे। इस प्रकार महात्मा पराशरवंशजोंके वे आठ पक्ष कहे गये हैं॥ ८४-८८॥
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वमिन्द्रप्रमितिसम्भवम् ।<br>वसिष्ठस्य कपिञ्जल्यां घृताच्यामुदपद्यत ॥ ८९<br>त्रिमूर्तिर्यः समाख्यातः इन्द्रप्रमितिरुच्यते ।<br>पृथोः सुतायां सम्भूतो भद्रस्तस्याभवद्वसुः ॥ ९०<br>उपमन्युः सुतस्तस्य बहवो ह्यौपमन्यवः ।<br>मित्रावरुणयोश्चैव कौण्डिन्या ये परिश्रुताः ॥ ९१<br>एकार्षेयास्तथा चान्ये वासिष्ठा नाम विश्रुताः ।<br>एते पक्षा वसिष्ठानां स्मृता दश महात्मनाम् ॥ ९२[हे ऋषियो!] अब इसके आगे इन्द्रप्रमितिकी उत्पत्तिके विषयमें जानिये। वसिष्ठका पुत्र कपिंजल्य घृताचीसे उत्पन्न हुआ था, जो त्रिमूर्ति नामसे भी विख्यात हुआ; उसे इन्द्रप्रमिति कहा जाता है। पृथुकी पुत्रीसे भद्र उत्पन्न हुआ और उस [भद्र]-का पुत्र वसु हुआ। उसका पुत्र उपमन्यु और उपमन्युके बहुत पुत्र हुए। कौण्डिन्य नामसे जो प्रसिद्ध हैं, वे मित्र तथा वरुणकी सन्तानें हैं और जो अन्य एकार्षेय हैं, वे वासिष्ठ नामसे प्रसिद्ध हैं। महात्मा वसिष्ठवंशजोंके ये दस पक्ष कहे गये हैं॥ ८९-९२॥
इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा मानसा विश्रुता भुवि ।<br>भर्तारश्च महाभागा एषां वंशाः प्रकीर्तिताः ॥ ९३<br>त्रिलोकधारणे शक्ता देवर्षिकुलसम्भवाः ।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९४<br>यैस्तु व्याप्तास्त्रयो लोकाः सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ ९५ये सब ब्रह्माके मानस पुत्रके रूपमें पृथ्वीपर विख्यात हैं। ये महाभाग [सबका] भरण करनेवाले हैं। [हे विप्रो!] मैंने इनके वंशोंका वर्णन कर दिया। देवर्षिकुलमें उत्पन्न होनेवाले ये सब तीनों लोकोंको धारण करनेमें समर्थ हैं। उनके पुत्र-पौत्र सैकड़ों तथा हजारों हैं, जिनके द्वारा सूर्यकी किरणोंकी भाँति तीनों लोक व्याप्त हैं॥ ९३-९५॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवादिसृष्टिकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवादिसृष्टिकथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६३॥