भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भूताः पिशाचाः सर्पांश्च सूकरा हस्तिनस्तथा।<br>वानराः किन्नराश्चैव ये च किम्पुरुषास्तथा॥ ६७वानर, किन्नर तथा किम्पुरुष—ये सब पुलस्त्यके पुत्र हुए॥ ६१–६७॥
अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे।<br>अत्रेः पत्न्यो दशैवासन् सुन्दर्यश्च पतिव्रताः॥ ६८<br>भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः।<br>भद्राभद्रा च जलदा मन्दा नन्दा तथैव च॥ ६९<br>बलाबला च विप्रेन्द्रा या च गोपाबला स्मृता।<br>तथा तामरसा चैव वरक्रीडा च वै दश॥ ७०<br>आत्रेयवंशप्रभवास्तासां भर्ता प्रभाकरः।<br>स्वर्भानुपिहिते सूर्ये पतितेऽस्मिन् दिवो महीम्॥ ७१<br>तमोऽभिभूते लोकेऽस्मिन् प्रभा येन प्रवर्तिता।<br>स्वस्त्यस्तु हि तवेत्युक्ते पतन्निह दिवाकरः॥ ७२<br>ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य पपात न विभुर्दिवः।<br>ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरत्रिर्महर्षिभिः॥ ७३उस वैवस्वत मन्वन्तरमें क्रतु निःसन्तान कहा गया है। अत्रीकी दस सुन्दर तथा पतिव्रता भार्याएँ थीं। घृताची अप्सरासे भद्राश्वकी दस पुत्रियाँ हुईं। हे विप्रेन्द्रो! वे भद्रा, अभद्रा, जलदा, मन्दा, नन्दा, बला, अबला, गोपाबला, तामरसा तथा वरक्रीड़ा—ये दस कही गयी हैं। ये सब आत्रेयवंशमें उत्पन्न हुईं; इनके पति प्रभाकर थे। जब राहुने सूर्यको ढक लिया और यह सूर्य स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरने लगा; तब इस लोकके अन्धकारसे व्याप्त हो जानेपर अत्रि ऋषिने प्रभा फैलायी थी। 'तुम्हारा कल्याण हो' उनके ऐसा कहनेपर महर्षिके वचनसे उस समय गिरता हुआ विभु सूर्य स्वर्गलोकसे [पृथ्वीपर] नहीं गिरा। तब महर्षियोंने प्रभु अत्रिको 'प्रभाकर'—ऐसा कहा॥ ६८–७३॥
भद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम्।<br>स तासु जनयामास पुनः पुत्रांस्तपोधनः॥ ७४<br>स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः।<br>तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ च महौजसौ॥ ७५<br>दत्तो ह्यत्रिवरो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः।<br>यवीयसी स्वसा तेषाममला ब्रह्मवादिनी॥ ७६<br>तस्य गोत्रद्वये जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि।<br>श्यावश्च प्रत्वसश्चैव ववल्गुश्चाथ गह्नरः॥ ७७<br>आत्रेयाणां च चत्वारः स्मृताः पक्षा महात्मनाम्।<br>काश्यपो नारदश्चैव पर्वतोऽनुद्धतस्तथा॥ ७८<br>जज्ञिरे मानसा होते अरुन्धत्या निबोधत।उन्होंने भद्रासे यशस्वी पुत्र 'सोम' को उत्पन्न किया। उन तपोधन [ऋषि]-ने उन पत्नियोंसे पुनः अन्य पुत्र भी उत्पन्न किये। वे सब स्वस्त्यात्रेय कहलाये और वेदोंके पारंगत ऋषि हुए। उनमें दो प्रसिद्ध यशवाले, ब्रह्मिष्ठ तथा महान् ओजस्वी हुए; दत्त अत्रिके ज्येष्ठ पुत्र थे और दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। उनकी छोटी बहन अमला थी; वह ब्रह्मवादिनी थी। उनके दो गोत्रोंमें श्याव, प्रत्वस, ववल्गु तथा गह्नर—ये चार उत्पन्न हुए, जो भूलोकमें प्रसिद्ध हैं। महान् आत्मावाले आत्रेयोंके चार पक्ष कहे गये हैं—काश्यप, नारद, पर्वत और अनुद्धत। ये मानस पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। अब अरुन्धतीकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ७४–७८ १/२॥
नारदस्तु वसिष्ठायारुन्धतीं प्रत्यपादयत्॥ ७९<br>ऊर्ध्वरेता महातेजा दक्षशापात्तु नारदः।<br>पुरा देवासुरे युद्धे घोरे वै तारकामये॥ ८०<br>अनावृष्ट्या हते लोके ह्युग्रे लोकेश्वरैः सह।<br>वसिष्ठस्तपसा धीमान् धारयामास वै प्रजाः॥ ८१नारदजीने वसिष्ठके लिये अरुन्धतीको प्रदान किया। महातेजस्वी नारद दक्षके शापसे ब्रह्मचारी हो गये। पूर्वकालमें तारकासुरके कारण भयानक देवासुर-संग्राममें अनावृष्टिसे हत लोकके उग्र हो जानेपर बुद्धिमान् वसिष्ठजीने [अपनी] तपस्यासे अन्न, जल, मूल, फल तथा औषधियाँ उत्पन्न करते हुए लोकेश्वरोंके साथ प्राणियोंकी रक्षा की थी और दयापूर्वक उन्होंने औषधिसे उन सबको जीवित किया था।