श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ६३ ] | दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन | २६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रैभ्यस्य रैभ्या विज्ञेया नैध्रुवस्य वदामि वः।<br>च्यवनस्य तु कन्यायां सुमेधाः समजायत ॥ ५२<br>नैध्रुवस्य तु सा पत्नी माता वै कुण्डपायिनाम्।<br>असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः समजायत ॥ ५३<br>शाण्डिल्यानां वरः श्रीमान् देवलः सुमहातपाः।<br>शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ॥ ५४ | भी रैभ्य [नामवाला] जानना चाहिये। [हे ऋषियो!] अब मैं नैध्रुवके पुत्रोंके विषयमें बताता हूँ। च्यवनकी कन्यासे सुमेधा उत्पन्न हुई। वह नैध्रुवकी पत्नी तथा कुण्डपायियोंकी माता थी। असितकी एकपर्णासे शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मिष्ठ, श्रीमान् तथा महातपस्वी देवल उत्पन्न हुए। इस प्रकार शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों पक्ष काश्यप (कश्यपसे होनेवाले) हुए॥ ४८–५४॥ |
| नवप्रकृतयोऽदेवाः पुलस्त्यस्य वदामि वः।<br>चतुर्युगे ह्यतिक्रान्ते मनोरेकादशे प्रभोः ॥ ५५<br>अर्धावशिष्टे तस्मिंस्तु द्वापरे सम्प्रवर्तिते।<br>मानवस्य नरिष्यन्तः पुत्र आसीद्दमः किल ॥ ५६<br>दमस्य तस्य दायादस्तृणबिन्दुरिति स्मृतः।<br>त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये सम्बभूव ह ॥ ५७<br>तस्य कन्या त्विलविला रूपेणाप्रतिमाभवत्।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ५८<br>ऋषीरैरविलो यस्यां विश्रवाः समजायत।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धनाः ॥ ५९<br>बृहस्पतेः शुभा कन्या नाम्ना वै देववर्णिनी।<br>पुष्पोत्कटा बलाका च सुते माल्यवतः स्मृते ॥ ६० | अब मैं पुलस्त्यके नौ राक्षसवंशजोंका वर्णन करता हूँ—प्रभु मनुके ग्यारहवें चतुर्युगके अतिक्रान्त होनेपर उसका आधा अवशिष्ट रह जानेपर जब द्वापरका आरम्भ हुआ, तब मनुकी पीढ़ीमें नरिष्यन्तका दम नामक पुत्र हुआ। उस दमका उत्तराधिकारी तृणबिन्दु कहा गया है; वह त्रेतायुगके तीन-चौथाई भागमें राजा हुआ। उसकी कन्या इलविला रूपमें अप्रतिम थी। उस राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको दे दी। उस इलविलासे ऋषि विश्रवा उत्पन्न हुए। पौलस्त्यकुलकी वृद्धि करनेवाली उनकी चार पत्नियाँ थीं। पहली देववर्णिनी नामवाली थी, जो बृहस्पतिकी सुन्दर कन्या थी। [अन्य दो] पुष्पोत्कटा तथा बलाका माल्यवान्की पुत्रियाँ कही गयी हैं। कैकसी मालीकी कन्या थी। [हे ऋषियो!] अब उनकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ५५–६० १/२ ॥ |
| कैकसी मालिनः कन्या तासां वै शृणुत प्रजाः।<br>ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्मात्सुषुवे देववर्णिनी ॥ ६१<br>कैकसी चाप्यजनयद्रावणं राक्षसाधिपम्।<br>कुम्भकर्णं शूर्पणखां धीमन्तं च विभीषणम् ॥ ६२<br>पुष्पोत्कटा ह्यजनयत्पुत्रांस्तस्माद् द्विजोत्तमाः।<br>महोदरं प्रहस्तं च महापाश्र्वं खरं तथा ॥ ६३<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां बलायाः शृणुत प्रजाः।<br>त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वश्च राक्षसः ॥ ६४<br>कन्या वै मालिका चापि बलायाः प्रसवः स्मृतः।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा नव ॥ ६५<br>विभीषणोऽतिशुद्धात्मा धर्मज्ञः परिकीर्तितः।<br>पुलस्त्यस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्याघ्राश्च दंष्ट्रिणः ॥ ६६ | देववर्णिनीने उन [विश्रवा]-से ज्येष्ठ [पुत्र] वैश्रवणको उत्पन्न किया। कैकसीने राक्षसोंके राजा रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा बुद्धिमान् विभीषणको जन्म दिया। हे द्विजश्रेष्ठो! पुष्पोत्कटाने उन [विश्रवा]-से महोदर, प्रहस्त, महापाश्र्व तथा खर [नामक] पुत्रोंको तथा कुम्भीनसी [नामक] कन्याको जन्म दिया। अब बलाकी सन्तानोंको सुनिये। त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व राक्षस और मालिका [नामक] कन्या—ये सब बलासे उत्पन्न कहे गये हैं। पुलस्त्यके ये नौ पौत्र क्रूर कर्मवाले राक्षस थे। विभीषण अत्यन्त शुद्ध आत्मावाले तथा धर्मज्ञ कहे गये हैं। मृग, व्याघ्र आदि दाढ़ोंवाले सभी पशु, भूत, पिशाच, सर्प, सूकर, हाथी, |